सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि फॉर्म-6 में किसी भी संशोधन को सुप्रीम कोर्ट की तरफ से मंजूरी नहीं दी गई है। यह टिप्पणी चुनाव आयोग के उस दावे के विपरीत है जिसमें नौ दिन पहले फॉर्म-6 के साथ लगाए गए डिक्लेरेशन को अदालत से अनुमति मिलने की बात कही गई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने दलील दी कि एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन से जुड़े करीब चौदह फैसले अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की चार अहम टिप्पणियां
अदालत ने कार्यवाही के दौरान साफ किया कि किसी भी अखबार की खबर के आधार पर सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त को सस्पेंड करने का अंतरिम आदेश पारित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि कोई भी मीडिया रिपोर्ट आंशिक या पूरी तरह गलत भी हो सकती है, इसलिए चुनाव आयोग का आधिकारिक जवाब और रिकॉर्ड देखना बेहद जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि निर्वाचन आयोग के सभी फैसले या तो सर्वसम्मति से होने चाहिए या फिर बहुमत के आधार पर लिए जाने चाहिए। तीन सदस्यीय आयोग में किसी एक सदस्य का अकेला निर्णय पूरे आयोग का फैसला नहीं माना जा सकता। अदालत ने संकेत दिया कि यदि रिकॉर्ड खंगालने के बाद एकतरफा फैसले साबित होते हैं, तो उन पर रोक लगाने के विकल्पों पर विचार किया जाएगा।
दो पीआईएल और राजनीतिक सरगर्मी
ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल और एसआईआर प्रक्रिया के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दो अलग-अलग जनहित याचिकाएं दाखिल की गई हैं। इनमें से एक याचिका राकेश कुमार सिंह की ओर से एडवोकेट विकास सिंह ने दायर की, जबकि दूसरी याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की तरफ से सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने पेश की। ज्ञानेश कुमार पर आरोप है कि उन्होंने अन्य दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की सहमति के बिना कई अहम फैसले लिए। हालांकि, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16 के तहत उन्हें कार्यकाल संबंधी कानूनी सुरक्षा प्राप्त है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच राजनीतिक हलचल भी तेज है और विपक्षी दल संसद के आगामी सत्रों में महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारियों पर विचार कर रहे हैं।






