छपरा (खबर डोज़ ब्यूरो) शहर के शैलफोर्ड इंटरनेशनल स्कूल के प्रांगण में पत्रकार, कवि और लेखक प्रभात किरण हिमांशु की पहली पुस्तक 'सुकुरती: एक अनोखा संबंध' का गरिमामयी माहौल में विमोचन किया गया। यह पुस्तक इंसान और एक बेजुबान जीव के बीच पनपने वाले निश्छल प्रेम, आत्मीयता और संवेदनाओं की अनूठी कहानी बयां करती है। खास बात यह है कि लेखक ने अपनी यह पहली साहित्यिक कृति नारी शक्ति को समर्पित की है, जिसमें साहित्य, शिक्षा और समाजसेवा से जुड़े कई गणमान्य लोग शामिल हुए। कार्यक्रम का औपचारिक उद्घाटन वरिष्ठ समाजसेवी इंदु प्रसाद, सिस्टर ज्योति, शिक्षाविद प्रीति सिंह, अर्चना श्रीवास्तव, रश्मि बाला और पंखुड़ी श्री ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इसके बाद अतिथियों के स्वागत और अभिनंदन के साथ पुस्तक का विधिवत लोकार्पण संपन्न हुआ। समारोह के दौरान मौजूद वक्ताओं ने साहित्य के महत्व और समाज में लेखकों की भूमिका पर अपने विचार साझा किए।

मानवीय संवेदनाओं और साहित्य पर वक्ताओं के विचार
वरिष्ठ समाजसेवी इंदु प्रसाद ने कहा कि वर्तमान पीढ़ी की लेखन और साहित्य में रुचि होना बेहद सुखद अनुभूति है। उन्होंने कहा कि प्रभात किरण हिमांशु ने अपनी पुस्तक के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं के विभिन्न पहलुओं को एक बेहतर दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करने का सार्थक प्रयास किया है। वहीं, सिस्टर ज्योति ने अपने संबोधन में कहा कि साहित्य व्यक्ति की चेतना का विकास करता है और उसे समाज तथा जीवन को समझने की एक नई दृष्टि प्रदान करता है। अर्चना श्रीवास्तव ने कहा कि कवि और लेखक समाज को नई दिशा देने का काम करते हैं, और प्रभात किरण हिमांशु भी अपनी रचनाओं के जरिए लगातार लोगों को प्रेरित कर रहे हैं। शिक्षाविद प्रीति सिंह ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों का स्वागत किया, जबकि वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. राजेश रंजन ने कहा कि लेखक और पत्रकार समाज के मजबूत स्तंभ होते हैं। उनकी रचनाएं समाज को जागरूक करने के साथ लोगों को संवेदनशील बनाती हैं।
लेखक ने साझा की पुस्तक के पीछे की भावना
इस अवसर पर लेखक प्रभात किरण हिमांशु ने अपनी पुस्तक के सृजन के पीछे की भावनाओं को साझा किया। उन्होंने बताया कि 'सुकुरती: एक अनोखा संबंध' केवल पन्नों और स्याही का संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक बेजुबान जीव और इंसान के बीच पनपे निश्छल, पवित्र और अटूट रिश्ते की सच्ची कहानी है।सुकुरती ने मुझे सिखाया कि प्रेम और संवेदना की कोई भाषा नहीं है। इन्हें शब्दों से ज्यादा दिल से महसूस किया जाता है। मैंने अपनी पुस्तक के माध्यम से इसी निश्छल भावना और आत्मीय लगाव को ईमानदारी से दर्ज करने की कोशिश की है।
कार्यक्रम के दौरान राकेश कुमार, अमितेश कुमार, शत्रुघ्न श्रीवास्तव, सुशील कुमार, संकेत किरण अंशु, नवीन कुमार, दीप्ति, अनामिका, पत्रकार सुरभित दत्त, किशोर कुमार, धनंजय कुमार गोलू, धर्मेंद्र रस्तोगी, विशाल कुमार, हेमंत, दधीचि देहदान समिति के सचिव संजीव चौधरी, शतरंज प्रशिक्षक राजशेखर, विकास श्रीवास्तव, वर्तिका, प्रथम, समृद्धि, उत्सव, उमंग और श्रेयांस समेत कई गणमान्य लोग मौजूद रहे। यह आयोजन अंततः साहित्य, मानवीय रिश्तों और बेजुबान जीवों के प्रति संवेदनशीलता को समर्पित रहा।






