बिहार में शराबबंदी को लागू हुए करीब 10 साल पूरे हो चुके हैं। लेकिन अब इस पूरी नीति की कामयाबी पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। खास बात ये है कि सवाल किसी राजनीतिक दल या विपक्षी नेता ने नहीं उठाया है, बल्कि देश की प्रतिष्ठित आर्थिक शोध संस्था NCAER यानी नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च की एक रिसर्च से सामने आया है। NCAER के शोधकर्ताओं ने बिहार में लागू पूर्ण शराबबंदी के सामाजिक और आर्थिक असर का विश्लेषण किया है। रिसर्च में दावा किया गया है कि जिस उद्देश्य से शराबबंदी लागू की गई थी, खासकर महिलाओं के खिलाफ हिंसा और अपराध को कम करना, उसमें नीति अपेक्षित तौर पर सफल नहीं रही।
दरअसल, बिहार में 1 अप्रैल 2016 को पूर्ण शराबबंदी लागू की गई थी। तत्कालीन सरकार का तर्क था कि शराब की उपलब्धता खत्म होने से घरेलू हिंसा कम होगी, महिलाओं की सुरक्षा बेहतर होगी और परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा। लेकिन NCAER के शोधकर्ताओं के मुताबिक, उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण इन दावों की पूरी तरह पुष्टि नहीं करता। रिसर्च में कहा गया है कि शराबबंदी लागू होने के बाद महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में अपेक्षित कमी नहीं दिखाई दी। कई मामलों में ऐसे अपराधों में बढ़ोतरी भी दर्ज की गई। यानी शराब की बिक्री पर रोक लगाने से महिलाओं के खिलाफ हिंसा और अपराध की समस्या अपने आप खत्म नहीं हुई।

NCAER के शोध के मुताबिक, शराब की मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई, बल्कि उसका एक हिस्सा अवैध बाजार की ओर चला गया। बिहार में अवैध शराब की तस्करी और बिक्री का नेटवर्क बढ़ा। इसका एक गंभीर परिणाम जहरीली शराब की घटनाओं के रूप में भी सामने आया है। रिसर्च में यह भी चिंता जताई गई है कि शराब की उपलब्धता पर प्रतिबंध के बाद कुछ लोगों ने दूसरे नशीले पदार्थों की तरफ रुख किया। नशीली गोलियां, कफ सिरप और दूसरे ड्रग्स का इस्तेमाल बढ़ने की बात भी शोध में सामने आती है। हालांकि, इन रुझानों को समझने के लिए अलग-अलग स्रोतों और स्थानीय आंकड़ों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
शराबबंदी से पहले शराब पर लगने वाला उत्पाद शुल्क राज्य के राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत था। रिसर्च में अनुमान लगाया गया है कि अगर शराब की बिक्री को दोबारा नियंत्रित तरीके से शुरू किया जाता है, तो राज्य के अपने राजस्व में करीब 14 से 15 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। यानी NCAER का तर्क है कि सरकार अगर शराबबंदी की जगह रेगुलेटेड सेल यानी विनियमित बिक्री का मॉडल अपनाती है, तो एक तरफ अवैध शराब के कारोबार पर लगाम लगाई जा सकती है और दूसरी तरफ सरकार को अतिरिक्त राजस्व मिल सकता है।

इस मॉडल में शराब की बिक्री पूरी तरह खुले बाजार के भरोसे नहीं छोड़ी जाएगी। सरकार दुकानों की संख्या और उनके संचालन पर नियंत्रण रख सकती है, बिक्री की डिजिटल निगरानी की जा सकती है और शराब पर भारी टैक्स लगाया जा सकता है। इसके साथ उम्र की जांच और बिक्री के समय पर सख्त नियम लागू किए जा सकते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि इससे अवैध शराब के कारोबार को कमजोर किया जा सकता है। साथ ही शराबबंदी लागू करने में पुलिस और प्रशासन पर होने वाला अतिरिक्त दबाव और खर्च भी कम हो सकता है। इसके बाद पुलिस और प्रशासन अपने संसाधनों को दूसरे गंभीर अपराधों और कानून-व्यवस्था की चुनौतियों पर लगा सकते हैं।
NCAER ने बिहार के विकास के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, शासन और कानून-व्यवस्था, बाढ़ नियंत्रण, निजी क्षेत्र के विकास और महिला सशक्तीकरण जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता देने की जरूरत भी बताई है। हालांकि, शराबबंदी खत्म करने का फैसला इतना आसान भी नहीं है। शराब से होने वाले स्वास्थ्य और सामाजिक नुकसान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए अगर कभी प्रतिबंध हटाने की दिशा में कदम बढ़ता है, तो उसके साथ सख्त नियम, जागरूकता अभियान, नशामुक्ति सेवाएं और महिलाओं की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना जरूरी होगा।

कुल मिलाकर, NCAER की रिसर्च ने बिहार की शराबबंदी नीति पर एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल अब सिर्फ ये नहीं है कि शराबबंदी जारी रहनी चाहिए या नहीं, बल्कि सवाल ये है कि बिहार में शराब और नशे की समस्या से निपटने का सबसे प्रभावी तरीका आखिर क्या हो? क्या पूर्ण शराबबंदी से समस्या का समाधान हो रहा है, या फिर सख्त सरकारी नियंत्रण के साथ विनियमित बिक्री ज्यादा प्रभावी हो सकती है? इस पर अंतिम फैसला सरकार को लेना है, लेकिन NCAER की रिसर्च ने निश्चित तौर पर बिहार की करीब एक दशक पुरानी शराबबंदी नीति की समीक्षा की मांग को और तेज कर दिया है।





