पटना (खबर डोज़ ब्यूरो)। बिहार के तीन दशक पुराने और चर्चित जहानाबाद नरसंहार मामले में पटना हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए उम्रकैद की सजा काट रहे नौ अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति कुमार मनीष की खंडपीठ ने ठोस साक्ष्यों और आरोपियों की विश्वसनीय पहचान के अभाव में निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया। अदालत ने इस मामले की जांच प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही बरतने वाले पुलिसकर्मियों की जवाबदेही तय करते हुए उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने का सख्त निर्देश बिहार के पुलिस महानिदेशक (DGP) को दिया है। इस फैसले के बाद न्यायिक और पुलिस महकमे में हलचल तेज हो गई है।
क्या था तीन दशक पुराना जहानाबाद नरसंहार मामला
यह सनसनीखेज वारदात 8 और 9 अगस्त 1996 की दरमियानी रात तत्कालीन जहानाबाद जिले के करपी थाना क्षेत्र के अंतर्गत केयार आहर के पास घटी थी। सिंचाई के पानी और बांध काटने से जुड़े एक विवाद को लेकर वहां पहरेदारी की जा रही थी, तभी अभियोजन के अनुसार 30 से 40 हथियारबंद लोगों ने हमला बोल दिया। इस खूनी संघर्ष में भारत सिंह, मंगर सिंह, राम निवास सिंह और नवलेश सिंह की मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य ग्रामीण गंभीर रूप से घायल हो गए थे। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद जहानाबाद की निचली अदालत ने 3 अप्रैल 2023 को इस मामले में आरोपियों को दोषी ठहराया था और 12 अप्रैल 2023 को उन्हें उम्रकैद व जुर्माने की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

हाईकोर्ट ने पुलिस जांच की कमियों को किया उजागर
94 पन्नों के अपने विस्तृत फैसले में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पुलिस की लचर जांच पर गहरी नाराजगी जताई। अदालत ने रेखांकित किया कि चूंकि घटना रात के अंधेरे में हुई थी, इसलिए आरोपियों की शिनाख्त के लिए अनिवार्य टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड यानी टीआईपी (TIP) नहीं कराई गई थी। इसके अलावा, शुरुआत में दर्ज प्राथमिकी में भी किसी भी आरोपी का नाम शामिल नहीं किया गया था। अदालत ने यह भी पाया कि चारों मृतकों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट और संबंधित डॉक्टरों की गवाही को विधिवत अदालत के सामने पेश नहीं किया गया था। घटनास्थल से खून से सनी मिट्टी, खाली कारतूस, लाठी और टॉर्च जैसी साक्ष्य सामग्री को जब्त करने व उनकी फोरेंसिक जांच कराने में भी भारी प्रशासनिक चूक सामने आई।

- डीजीपी को वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की तीन सदस्यीय समिति गठित करने का निर्देश दिया गया है।
- जांच में हुई लापरवाही की पड़ताल कर जिम्मेदार कर्मियों पर तीन महीने के भीतर कार्रवाई करनी होगी।
- गृह विभाग से कमजोर जांच के कारण बरी हुए मामलों की नीति और अधिकारियों पर कार्रवाई का ब्योरा मांगा गया है।
- हिरासत में बंद आरोपियों को अन्य मामलों में वांछित न होने पर तत्काल रिहा करने के आदेश दिए गए हैं।
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कोई भी घटना कितनी भी वीभत्स क्यों न हो, लेकिन किसी भी व्यक्ति को कानूनन दोषी ठहराने के लिए अदालत में पर्याप्त और अकाट्य साक्ष्य होने जरूरी हैं। केवल संदेह के आधार पर किसी को ताउम्र सजा के दायरे में नहीं रखा जा सकता। इस उच्च न्यायालय के आदेश के बाद अब राज्य गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय को तीन महीने के भीतर अपनी आंतरिक जांच रिपोर्ट सौंपनी होगी, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि शुरुआती दौर की तफ्तीश में किस स्तर पर और किसने गंभीर लापरवाही बरती थी।





