प्राप्त जानकारियों के अनुसार, संगठित भू माफियाओं की गतिविधियों की गहराई से पड़ताल के दौरान जांच एजेंसियों को इस बड़े गठजोड़ की भनक लगी। शुरुआती जांच के दायरे में राज्य के करीब 18 अंचल आ चुके हैं, जहां उच्चस्तरीय जांच चल रही है। विशेष तौर पर जमुई जिले का सिकंदरा, पटना जिले के बख्तियारपुर, खुसरूपुर और नौबतपुर तथा मुजफ्फरपुर जिले के मुसहरी अंचल में इस तरह के अवैध कारनामों की पुष्टि होने पर संबंधित विभागों को कड़ी कार्रवाई करने की आधिकारिक अनुशंसा भेजी जा चुकी है।

कैसे काम करता है जमीन माफिया और अफसरों का यह सिंडिकेट?
जांच में यह बात सामने आई है कि भू माफिया सबसे पहले किसी भी लक्षित जमीन को कानूनी रूप से विवादित बनाने की साजिश रचते हैं। इसके लिए सुनियोजित तरीके से 80 से 100 साल पुराने नकली और फर्जी केवाला यानी दस्तावेज तैयार किए जाते हैं। इन जाली दस्तावेजों को आधार बनाकर माफिया अपने ही सहयोगियों या सदस्यों के नाम पर उस जमीन की अवैध रजिस्ट्री करा लेते हैं। इसके बाद राजस्व अंचल के भ्रष्ट कर्मियों और अधिकारियों की मिलीभगत से मिली मनमाफिक रिपोर्ट के आधार पर उस जमीन का दाखिल-खारिज भी आसानी से करा लिया जाता है।

अंचलाधिकारियों की संदिग्ध भूमिका और लंबित शिकायतें
इस पूरे फर्जीवाड़े में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इसमें सीधे तौर पर अंचलाधिकारियों, राजस्व पदाधिकारियों और राजस्व कर्मियों की संलिप्तता सामने आ रही है। स्थिति यह है कि जब जमीन के असली और वैध दावेदार सीओ से लेकर डीसीएलआर और अपर समाहर्ता तक न्याय की गुहार लगाते हुए अपनी शिकायत दर्ज कराते हैं, तब भी लंबी समयावधि तक मामलों की सुनवाई नहीं की जाती है। प्रशासनिक सुस्ती के कारण भू माफिया का अवैध कब्जा उस जमीन पर लगातार बरकरार रहता है, और जांच एजेंसियों को ईओयू की छानबीन के दौरान ऐसी कई गंभीर शिकायतें प्राप्त हुई हैं जिन पर अब शिकंजा कसने की तैयारी चल रही है।





