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बिहार की अदालतों में शराबबंदी के 5.5 लाख से ज्यादा मामले लंबित, तीन लाख में आरोपियों की पेशी नहीं

| Published: | Updated:
बिहार की अदालतों में शराबबंदी के 5.5 लाख से ज्यादा मामले लंबित, तीन लाख में आरोपियों की पेशी नहीं
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मुख्य बातें

  • बिहार में शराबबंदी कानून लागू होने के लगभग एक दशक बाद इसका सीधा असर अब राज्य की न्याय व्यवस्था और निचली अदालतों के कामकाज पर दिखने लगा है।
  • अदालतों में शराबबंदी से जुड़े मुकदमों का अंबार लग गया है, जिससे मुकदमों के निपटारे में भारी बाधा आ रही है।
  • हालिया आंकड़ों के मुताबिक, राज्य की निचली अदालतों में उत्पाद अधिनियम से जुड़े कुल 5 लाख 54 हजार 795 मामले लंबित हैं, जो कुल लंबित मामलों का करीब 30.28 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं।
  • इन मामलों में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लगभग 2 लाख 99 हजार 420 मामलों में आरोपियों की पेशी ही सुनिश्चित नहीं हो पा रही है, जिससे सुनवाई आगे नहीं बढ़ पा रही है।

खबर डोज़ ब्यूरो। बिहार में शराबबंदी कानून लागू होने के लगभग एक दशक बाद इसका सीधा असर अब राज्य की न्याय व्यवस्था और निचली अदालतों के कामकाज पर दिखने लगा है। अदालतों में शराबबंदी से जुड़े मुकदमों का अंबार लग गया है, जिससे मुकदमों के निपटारे में भारी बाधा आ रही है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, राज्य की निचली अदालतों में उत्पाद अधिनियम से जुड़े कुल 5 लाख 54 हजार 795 मामले लंबित हैं, जो कुल लंबित मामलों का करीब 30.28 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं। इन मामलों में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लगभग 2 लाख 99 हजार 420 मामलों में आरोपियों की पेशी ही सुनिश्चित नहीं हो पा रही है, जिससे सुनवाई आगे नहीं बढ़ पा रही है।

बिहार की अदालतों में शराबबंदी के 5.5 लाख से ज्यादा मामले लंबित, तीन लाख में आरोपियों की पेशी नहीं

क्यों अटक रहे हैं शराबबंदी कानून के मामले?

बिहार में साल 2016 में शराबबंदी कानून लागू होने के बाद से इससे जुड़े भारी संख्या में केस दर्ज किए गए थे। हालांकि, समय पर मामलों का निस्तारण न होने के पीछे कई प्रशासनिक और कानूनी अड़चनें सामने आ रही हैं। आंकड़ों के अनुसार, आरोपियों की गैर-हाजिरी के अलावा पुलिस की ओर से समय पर जरूरी कागजात जमा न किया जाना, अभियोजन पक्ष द्वारा साक्ष्य पेश न कर पाना, आरोप गठन में देरी, बहस और फैसला सुनाए जाने में विलंब जैसी वजहें इस लंबित मामलों के पहाड़ को और बड़ा कर रही हैं।

राजधानी पटना की स्थिति इस मोर्चे पर सबसे गंभीर नजर आती है। अकेले पटना जिले में शराबबंदी से जुड़े 56,583 मामले लंबित हैं। इनमें से 49,108 मामले सिर्फ आरोपियों की पेशी और हाजिरी न लगने के कारण अटके हुए हैं। इसके अलावा पटना में 2,355 मामले पुलिस पेपर जमा न होने, 2,480 मामले अभियोजन साक्ष्य न मिलने, 1,108 मामले आरोप गठन न होने, 357 मामले बहस और 295 मामले फैसला नहीं आने की वजह से पेंडिंग हैं। पटना के अलावा गया में 28,781, मधुबनी में 26,365, चंपारण में 26,314, सीतामढ़ी में 24,515, सीवान में 23,037, छपरा में 23,033, सारण में 21,746 और आरा में 21,381 मामले अदालतों में लंबित दर्ज किए गए हैं।

बिहार की अदालतों में शराबबंदी के 5.5 लाख से ज्यादा मामले लंबित, तीन लाख में आरोपियों की पेशी नहीं

न्याय व्यवस्था के सामने खड़ी हुई बड़ी चुनौती

राज्य में गंभीर आपराधिक मामलों जैसे हत्या, लूट, डकैती, रेप और अपहरण के कुल 18 लाख 40 हजार 949 मामले पहले से ही लंबित हैं। ऐसे में उत्पाद अधिनियम के इन लाखों मामलों का जुड़ जाना निचली अदालतों के न्यायाधीशों और प्रशासनिक तंत्र पर अतिरिक्त दबाव बना रहा है। पुलिस कार्रवाई और गिरफ्तारी के बाद यदि समय पर कागजी कार्रवाई पूरी न हो और अभियुक्तों की कोर्ट में उपस्थिति दर्ज न कराई जाए, तो लंबित मुकदमों की इस संख्या को कम करना न्याय प्रणाली के लिए एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।

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