सपने में मां काली के दर्शन और परीक्षा का दावा
किशोरी निशा कुमारी का दावा है कि सावन महीने के बाद उसे सपने में मां काली दिखाई दी थीं और परीक्षा लेने की बात कही गई थी, जिसके बाद उसने इस कठिन मार्ग को चुना। परिजनों और ग्रामीणों के अनुसार, जिस बोर्ड पर निशा लेटी है, उसमें लगभग ढाई इंच लंबी और कुल 35 किलोग्राम कीलें लगाई गई हैं, जिसे चार लोगों ने मिलकर चार दिनों में तैयार किया था। निशा का कहना है कि उसे इन कीलों पर लेटने पर किसी प्रकार का दर्द महसूस नहीं हो रहा है और उसके लिए ये कीलें फूलों जैसी हैं। हालांकि, इन दावों की किसी स्वतंत्र या वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है।

बीमारी और परिवार की आर्थिक स्थिति का पहलू
किशोरी के पिता प्रकाश मल्लिक साफ-सफाई का काम करने के साथ सूप-दौरी बुनकर अपने परिवार का गुजारा चलाते हैं। उन्होंने मीडिया को बताया कि उनकी बेटी की तबीयत पिछले करीब डेढ़ साल से लगातार खराब चल रही थी। उन्होंने कई जगहों पर उसका इलाज कराया, जिसमें दवाइयों और अन्य उपचार पर लगभग तीन लाख रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन स्वास्थ्य में कोई खास सुधार नहीं हुआ। पिता के अनुसार, निशा बचपन से ही पूजा-पाठ में गहरी रुचि रखती थी और करीब 13 वर्ष की उम्र से ही देवी-देवताओं की आराधना में अधिक समय देने लगी थी। परिवार को बेटी की इस कठिन साधना को लेकर भय भी सता रहा है, लेकिन निशा अपनी जिद पर अडिग है।

निशा की साधना की खबर फैलते ही वहाँ श्रद्धालुओं का तांता लग गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, उसे देखने के लिए पटना, आरा, बक्सर, पश्चिम चंपारण, भागलपुर, समस्तीपुर, कटिहार और आसनसोल जैसे दूर-दराज के स्थानों से भी लोग पहुँच रहे हैं। भारी भीड़ जुटने के कारण गाँव की संकरी सड़कों पर आवागमन भी प्रभावित हो रहा है। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए परिजन लगातार लोगों से शांति बनाए रखने की अपील कर रहे हैं। दूसरी ओर, चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी कम उम्र में और पहले से अस्वस्थ रहने के दौरान कीलों पर लंबे समय तक लेटना तथा सीने पर भारी वजन रखना शारीरिक चोट या गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकता है। धार्मिक आस्था और मान्यताओं के बीच किशोरी की शारीरिक सुरक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना भी उतना ही आवश्यक माना जा रहा है। प्रशासनिक और चिकित्सीय स्तर पर इस मामले को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक हस्तक्षेप सामने नहीं आया है।





