भागलपुर (खबर डोज़ ब्यूरो) बिहार के भागलपुर के नाथनगर स्थित ऐतिहासिक महाशय ड्योढ़ी दुर्गा मंदिर में बोधन घट की स्थापना के साथ ही 18 दिनों तक चलने वाली अनूठी दुर्गापूजा की शुरुआत हो गई है। मुगलकाल से चली आ रही इस सदियों पुरानी परंपरा के तहत इस वर्ष भी बंगाली विधि-विधान और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच मां दुर्गा का आह्वान किया गया है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।
साढ़े चार सौ साल पुरानी परंपरा और कौड़ी लूट
उत्तर भारत में शारदीय नवरात्र के सामान्य दिनों से हटकर महाशय ड्योढ़ी में दुर्गापूजा पूरे 18 दिनों तक मनाई जाती है। जितिया के पावन उपवास से शुरू होने वाली इस पूजा का इतिहास मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल से जुड़ा है। किंवदंतियों के अनुसार, उस दौरान 'कानूनगो' के रूप में कार्यरत श्रीराम घोष ने इस परंपरा की नींव रखी थी, जिसे वर्तमान में घोष परिवार की 22वीं पीढ़ी और ट्रस्ट द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है।
मंदिर परिसर में बोधन घट की स्थापना के बाद यहाँ पारंपरिक कौड़ी लूट का आयोजन किया गया। मान्यता है कि कौड़ी धन, सुख और समृद्धि का प्रतीक है। इस धार्मिक अनुष्ठान में भाग ले रही महिलाओं ने कौड़ियों को अपनी सिंदूर की डिबिया में सुरक्षित रखा ताकि गृहस्थ जीवन में सौभाग्य बना रहे। आयोजकों के अनुसार, ऐसी कुल तीन बार कौड़ी लूट की परंपरा बोधन घट, चतुर्थी और सप्तमी पूजा के अवसर पर निभाई जाती है.

बंगाली रीति-रिवाज और अनोखा प्रतिमा विसर्जन
इस पूरे आयोजन को लेकर सार्वजनिक पूजा समारोह समिति के महासचिव देवाशीष बनर्जी ने बताया कि महाशय ड्योढ़ी की पूजा बंगाली पद्धति और परंपराओं के अनुसार होती है, जहाँ प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं।
"महाशय ड्योढ़ी की पूजा बंगाली पद्धति और परंपराओं के अनुसार पूरे विधि-विधान से होती है। यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं की मां दुर्गा में गहरी आस्था है। लोगों का विश्वास है कि मां के दरबार में उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यही वजह है कि पूजा के दौरान महाशय ड्योढ़ी में हर दिन करीब दो से तीन हजार लोगों की भीड़ जुटती है और यहाँ मेले जैसा माहौल रहता है।" - देवाशीष बनर्जी, महासचिव, सार्वजनिक पूजा समारोह समिति
यहाँ की पूजा का समापन भी बेहद खास होता है। जहाँ आज के समय में अधिकांश स्थानों पर प्रतिमाओं को वाहनों से ले जाया जाता है, वहीं महाशय ड्योढ़ी में माँ दुर्गा की प्रतिमा को श्रद्धालु आज भी अपने कंधों पर उठाकर विसर्जन घाट तक ले जाते हैं। इस साल 4 अक्टूबर से शुरू हुए ये धार्मिक अनुष्ठान 21 अक्टूबर तक चलेंगे, जिसमें पंडित शुभाशीष लाहेरी द्वारा वैदिक और बंगाली मंत्रोच्चार संपन्न कराए जा रहे हैं।





