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बिहार-झारखंड बंटवारे की यादें: सम्राट चौधरी बोले- दुखी मन से की थी वोटिंग, अटल जी की थी अलग सोच

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बिहार-झारखंड बंटवारे की यादें: सम्राट चौधरी बोले- दुखी मन से की थी वोटिंग, अटल जी की थी अलग सोच
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मुख्य बातें

  • बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने वर्ष 2000 में हुए बिहार और झारखंड के विभाजन से जुड़े संस्मरण साझा करते हुए राज्य के राजनीतिक इतिहास के पन्नों को पलटा है।
  • उन्होंने बताया कि जब संसद और विधानसभाओं में राज्य के पुनर्गठन की प्रक्रिया चल रही थी, तब उनके और नेता श्रवण कुमार के लिए वह फैसला बेहद भावनात्मक और कठिन था।
  • उन्होंने स्पष्ट किया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सोच आदिवासी बहुल क्षेत्रों के समग्र विकास और उनकी सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने के लिए एक अलग राज्य के गठन की थी।
  • केंद्र सरकार की ओर से क्षेत्रीय विकास और सामाजिक न्याय की अवधारणा के तहत झारखंड राज्य के निर्माण का निर्णय लिया गया था।

बिहार और झारखंड विभाजन की राजनीतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने वर्ष 2000 में हुए बिहार और झारखंड के विभाजन से जुड़े संस्मरण साझा करते हुए राज्य के राजनीतिक इतिहास के पन्नों को पलटा है। उन्होंने बताया कि जब संसद और विधानसभाओं में राज्य के पुनर्गठन की प्रक्रिया चल रही थी, तब उनके और नेता श्रवण कुमार के लिए वह फैसला बेहद भावनात्मक और कठिन था। उन्होंने स्पष्ट किया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सोच आदिवासी बहुल क्षेत्रों के समग्र विकास और उनकी सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने के लिए एक अलग राज्य के गठन की थी।

बिहार-झारखंड बंटवारे की यादें: सम्राट चौधरी बोले- दुखी मन से की थी वोटिंग, अटल जी की थी अलग सोच

अटल बिहारी वाजपेयी की परिकल्पना और प्रशासनिक कदम

केंद्र सरकार की ओर से क्षेत्रीय विकास और सामाजिक न्याय की अवधारणा के तहत झारखंड राज्य के निर्माण का निर्णय लिया गया था। प्रशासनिक सुधारों और स्थानीय जनता की आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए यह पुनर्गठन किया गया, जिसके तहत खनिज संपदा और औद्योगिक घरानों से परिपूर्ण क्षेत्र को एक स्वतंत्र प्रशासनिक इकाई का दर्जा मिला।

विभाजन का बिहार की आर्थिकी पर प्रभाव और राजस्व का गणित

बिहार-झारखंड का यह विभाजन केवल भौगोलिक सीमाओं का निर्धारण नहीं था, बल्कि इसने राज्य की अर्थव्यवस्था को गहरा आघात पहुंचाया था। उस दौर के वित्तीय आंकड़ों का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि टाटा और बोकारो जैसे प्रमुख औद्योगिक और खनन क्षेत्र झारखंड में चले गए, जो कि बिहार की कुल आय का लगभग 87 प्रतिशत हिस्सा हुआ करते थे। विभाजन के बाद बिहार के हिस्से में महज 13 प्रतिशत राजस्व ही बचा, जिससे राज्य की वित्तीय स्थिति शुरुआती वर्षों में अत्यधिक चुनौतीपूर्ण हो गई थी।

  • औद्योगिक नुकसान: झारखंड के अलग होने से खनिज रॉयल्टी और भारी उद्योगों से मिलने वाला टैक्स राजस्व पूरी तरह बंट गया।
  • बजेट संतुलन की चुनौती: विभाजन के तुरंत बाद बिहार सरकार को बेहद सीमित संसाधनों के साथ अपनी प्रशासनिक और विकास योजनाओं का संचालन करना पड़ा।
  • आर्थिक सुधार: शुरुआती बाधाओं के बावजूद राज्य ने आने वाले वर्षों में अपनी आंतरिक कर प्रणाली और अन्य माध्यमों से राजस्व बढ़ाने के प्रयास तेज किए।

बिहार-झारखंड बंटवारे की यादें: सम्राट चौधरी बोले- दुखी मन से की थी वोटिंग, अटल जी की थी अलग सोच

वित्तीय स्वावलंबन और वर्तमान प्रशासनिक स्थिति

समय के साथ बिहार ने अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ किया है और राज्य के बजट के आकार में ऐतिहासिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सरकार के प्रशासनिक आंकड़ों के मुताबिक, विभिन्न वित्तीय वर्षों में नीतियों के बेहतर क्रियान्वयन और केंद्रीय सहायता के उपयोग से राज्य की आय में निरंतर सुधार देखा गया है। वित्तीय प्रबंधन और विकासात्मक प्राथमिकताओं के जरिए राज्य ने विभाजन के समय उत्पन्न आर्थिक संकट से उबरते हुए अपने बजट को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है, जिससे प्रशासनिक मशीनरी को ग्रामीण और शहरी विकास कार्यों को गति देने में मदद मिल रही है।

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