खबर डोज़ ब्यूरो। बिहार की राजनीति में एक बार फिर लालू परिवार और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के भविष्य को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है। आईआरसीटीसी मामले में अदालत की कार्यवाही के बाद लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव की कानूनी मुश्किलें बढ़ने के बीच यह सवाल उठने लगा है कि यदि परिवार पर दबाव बढ़ता है, तो पार्टी की कमान किसके हाथ में जाएगी। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि क्या सिंगापुर से लौटने के बाद रोहिणी आचार्य को आरजेडी में कोई बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है, जिससे पार्टी के भीतर और बाहर नए समीकरण बन सकते हैं।
लालू प्रसाद यादव को किडनी दान करने के बाद रोहिणी आचार्य ने भावनात्मक रूप से देश भर में सुर्खियां बटोरी थीं। इसके बाद उन्होंने साल 2024 के लोकसभा चुनाव में सारण संसदीय सीट से चुनावी मैदान में कदम रखा था, हालांकि उन्हें उस चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद नवंबर 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान उनके राजनीति से दूरी बनाने के संकेत मिले थे। लेकिन अब एक बार फिर उनकी राजनीतिक गतिविधियों में संभावित वापसी को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है।

क्या रोहिणी आचार्य संभालेंगी संगठन की कमान
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि लालू परिवार के प्रमुख नेताओं की कानूनी उलझने बढ़ती हैं, तो आरजेडी के भीतर नेतृत्व को लेकर बड़े फैसले लिए जा सकते हैं। रोहिणी आचार्य के सामने पार्टी में वापसी के कई रास्ते हो सकते हैं, जिनमें संगठनात्मक जिम्मेदारी संभालना और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद बढ़ाना शामिल है। परिवार के प्रति उनकी भावनात्मक छवि पार्टी के पुराने और वफादार समर्थकों को एकजुट रखने में मददगार साबित हो सकती है। इसके अलावा, महिला कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की चुनौती भी उनके सामने होगी।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि रोहिणी आचार्य के आरजेडी की कमान संभालने को लेकर अभी तक पार्टी की ओर से किसी आधिकारिक या अंतिम फैसले की पुष्टि नहीं की गई है। यह पूरी तरह से राजनीतिक संभावनाओं और कयासों का दौर है। पार्टी में तेजस्वी यादव की मौजूदा भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण बनी हुई है। ऐसे में नेतृत्व को लेकर कोई भी बदलाव पूरी तरह से परिवार और संगठन के सामूहिक निर्णयों पर ही निर्भर करेगा।

कानूनी चुनौतियों के बीच संगठन को एकजुट रखने की चुनौती
बिहार के सियासी गलियारों में इस बात पर भी मंथन चल रहा है कि यदि कानूनी और राजनीतिक मोर्चे पर लालू परिवार को संघर्ष करना पड़ा, तो आरजेडी के सामने अपने पारंपरिक वोट बैंक और कार्यकर्ताओं को साधे रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी। जनता के बीच जाकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने और नए मुद्दों पर मुखर होने की रणनीति ही किसी भी नेता के भविष्य को तय करती है। फिलहाल, इन सभी सवालों के स्पष्ट जवाब भविष्य के गर्भ में हैं, लेकिन लालू परिवार की मौजूदा परिस्थितियों ने राज्य की राजनीति का पारा जरूर बढ़ा दिया है।





