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बिहार शराबबंदी के 10 साल: BAI का दावा, राज्य को हुआ ₹60,000 करोड़ का राजस्व नुकसान

By | Published: 14 Jul 2026, 04:29 PM
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बिहार शराबबंदी के 10 साल: BAI का दावा, राज्य को हुआ ₹60,000 करोड़ का राजस्व नुकसान
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मुख्य बातें

  • बिहार में शराबबंदी के 10 साल: आर्थिक और सामाजिक प्रभाव पर बड़ा दावाबिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू हुए एक दशक का समय बीत रहा है, लेकिन इसके आर्थिक और सामाजिक प्रभावों को...
  • बीयर बनाने वाली कंपनियों की शीर्ष संस्था, ब्रुअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) ने दावा किया है कि इस नीति से राज्य को लाभ की तुलना में नुकसान अधिक उठाना पड़ा है।
  • एसोसिएशन के अनुसार, पिछले 10 वर्षों के दौरान बिहार सरकार को ₹60,000 करोड़ से अधिक के उत्पाद शुल्क राजस्व का नुकसान हुआ है, जबकि राज्य में अवैध शराब की समानांतर अर्थव्य...
  • इसके तहत अप्रैल 2016 में देशी और विदेशी शराब की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था।

बिहार में शराबबंदी के 10 साल: आर्थिक और सामाजिक प्रभाव पर बड़ा दावा

बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू हुए एक दशक का समय बीत रहा है, लेकिन इसके आर्थिक और सामाजिक प्रभावों को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। बीयर बनाने वाली कंपनियों की शीर्ष संस्था, ब्रुअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) ने दावा किया है कि इस नीति से राज्य को लाभ की तुलना में नुकसान अधिक उठाना पड़ा है। एसोसिएशन के अनुसार, पिछले 10 वर्षों के दौरान बिहार सरकार को ₹60,000 करोड़ से अधिक के उत्पाद शुल्क राजस्व का नुकसान हुआ है, जबकि राज्य में अवैध शराब की समानांतर अर्थव्यवस्था लगातार फल-फूल रही है।

शराबबंदी के उद्देश्य और वर्तमान स्थिति

बिहार में घरेलू हिंसा और सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने के उद्देश्य से तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं (जीविका दीदियों) की मांग पर अप्रैल 2016 में शराबबंदी लागू की थी। इसके तहत अप्रैल 2016 में देशी और विदेशी शराब की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। हालांकि, बीएआई का कहना है कि यह नीति अपने मूल उद्देश्यों को प्राप्त करने में विफल रही है और अब इसकी व्यापक समीक्षा की आवश्यकता है।

कानूनी और प्रशासनिक तंत्र पर बढ़ता दबाव

एसोसिएशन द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, साल 2016 से अब तक बिहार में शराबबंदी कानूनों के तहत 11.3 lakh से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं। इसके साथ ही, इस कानून के तहत 17 लाख से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है। बीएआई का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में मामलों और गिरफ्तारियों के बावजूद अवैध शराब की बरामदगी लगातार जारी है। इस नीति के कारण राज्य की पुलिस और न्यायपालिका के बहुमूल्य संसाधन शराबबंदी को लागू कराने में ही खर्च हो रहे हैं, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है।


₹60,000 करोड़ का राजस्व नुकसान और आर्थिक चुनौतियां

आर्थिक मोर्चे पर शराबबंदी के प्रभावों को अत्यंत गंभीर बताते हुए बीएआई ने कहा है कि बिहार ने पिछले दस वर्षों में लगभग ₹60,000 करोड़ का राजस्व गंवाया है। इसके अलावा, होटल, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स, परिवहन और अन्य सहायक उद्योगों को भी भारी आर्थिक क्षति पहुंची है।

एसोसिएशन के महानिदेशक विनोद गिरी ने बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को लिखे एक पत्र में इस बात को रेखांकित किया है कि बिहार वर्तमान में देश में सबसे कम प्रति व्यक्ति आय वाला राज्य है। इसके बावजूद, राज्य ने अपने सबसे बड़े राजस्व स्रोतों में से एक को स्वेच्छा से छोड़ दिया है। इस वित्तीय नुकसान के कारण राज्य सरकार के लिए अपने स्वयं के कर राजस्व से वेतन और पेंशन जैसी बुनियादी वित्तीय जिम्मेदारियों को पूरा करना भी चुनौतीपूर्ण हो गया है, जिससे केंद्रीय सहायता और उधारी पर निर्भरता बढ़ गई है।

अवैध और भूमिगत अर्थव्यवस्था का उदय

बीएआई के महानिदेशक विनोद गिरी का कहना है कि शराबबंदी ने बिहार से शराब को समाप्त नहीं किया है, बल्कि इसे कानूनी और नियंत्रित बाजार से हटाकर एक अवैध और भूमिगत अर्थव्यवस्था में धकेल दिया है। उनके अनुसार, "शराब गायब नहीं हुई है, बल्कि यह केवल सरकार के नियंत्रण से बाहर चली गई है।" देश के सबसे सख्त कानूनों में से एक होने के बावजूद, राज्य की सीमाओं के पार से संचालित होने वाले तस्करी नेटवर्क के जरिए शराब की आपूर्ति लगातार बनी हुई है।


सुधार के लिए बीएआई के प्रमुख सुझाव

इस स्थिति से निपटने के लिए ब्रुअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने बिहार सरकार के समक्ष एक चरणबद्ध और सख्त नियामकीय मॉडल का प्रस्ताव रखा है। इस मॉडल का उद्देश्य पूर्ण प्रतिबंध के बजाय नुकसान को कम करना है। इसके तहत निम्नलिखित सुझाव दिए गए हैं:

  • कम अल्कोहल वाले पेय पदार्थों की अनुमति: पहले चरण में बीयर और वाइन जैसे कम अल्कोहल वाले उत्पादों की बिक्री की अनुमति दी जानी चाहिए।
  • सीमित शुरुआत: इस व्यवस्था को शुरुआत में बेहतर निगरानी वाले शहरी क्षेत्रों और आर्थिक जोनों में लागू किया जाना चाहिए।
  • अल्कोहल मात्रा आधारित कर प्रणाली: कम अल्कोहल वाले उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए टैक्स का निर्धारण अल्कोहल की मात्रा के आधार पर किया जाए।
  • नशामुक्ति और पुनर्वास कोष: नशामुक्ति और पुनर्वास कार्यक्रमों के संचालन के लिए एक समर्पित कोष की स्थापना की जाए।
  • महिला कल्याण उपकर (Women Welfare Cess): महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों के वित्तपोषण के लिए एक विशेष उपकर लगाया जाए।
  • महिलाओं की आर्थिक भागीदारी: उद्योगों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए कारखानों में 50 प्रतिशत से अधिक रोजगार महिलाओं को देने का प्रावधान किया जाए।

बीएआई का मानना है कि बिहार इस समय एक महत्वपूर्ण नीतिगत मोड़ पर है, जहां वह जनहित, सामाजिक जिम्मेदारी और आर्थिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाने वाली एक नई व्यवस्था विकसित कर सकता है।

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