लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर नई आरजेडी में जगह किसे मिलेगी? पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल ने इसको लेकर काफी कुछ साफ कर दिया है। उनके बयान से संकेत मिल रहा है कि अब सिर्फ राजनीतिक पहचान या पुराने जुड़ाव के आधार पर संगठन में जगह मिलना आसान नहीं होगा।

मंगनी लाल मंडल के मुताबिक, पार्टी में पढ़े-लिखे, सक्षम, निष्ठावान, समझदार, संघर्षशील और मेहनती लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी। यानी आरजेडी अब ऐसे चेहरों को संगठन में आगे लाने की तैयारी में है, जो पार्टी की विचारधारा को समझते हों और जमीन पर सक्रिय होकर काम करने की क्षमता रखते हों।
उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी के लिए संघर्ष करने वाले लोगों को महत्व दिया जाएगा। धरना-प्रदर्शन में भाग लेने वाले, आंदोलन के दौरान जेल जाने से पीछे नहीं हटने वाले और पार्टी के लिए लगातार मेहनत करने वाले कार्यकर्ताओं को भी तरजीह मिलेगी।
यानी आसान भाषा में कहें तो आरजेडी में नई एंट्री की योग्यता सिर्फ पढ़ाई-लिखाई तक सीमित नहीं रहने वाली है। पार्टी ऐसे लोगों को तलाश रही है, जिनमें शिक्षा के साथ संघर्ष करने का जज्बा और संगठन के प्रति निष्ठा भी हो। अब इस फैसले को बिहार की बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़कर भी देखा जा रहा है। बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे के बाद आरजेडी के सामने संगठन को मजबूत करने की चुनौती और बढ़ गई है। पार्टी की कोशिश है कि समाज के अलग-अलग वर्गों को संगठन से जोड़ा जाए और नए चेहरों को मौका दिया जाए।

इसी बीच तेजस्वी यादव की ओर से शिक्षकों के लंबित वेतन और शिक्षकों के स्थानांतरण से जुड़े मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री को लिखी गई चिट्ठी का भी मंगनी लाल मंडल ने समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों का लंबित वेतन जल्द से जल्द मिलना चाहिए, क्योंकि यह उनका अधिकार है। तेजस्वी यादव ने अपनी चिट्ठी में सरकारी विद्यालयों में उर्दू, अरबी और फारसी शिक्षकों के अनुचित स्थानांतरण का मुद्दा उठाया था। साथ ही अनुदानित मदरसों और संस्कृत विद्यालयों के शिक्षक-कर्मियों के लंबित वेतन के तत्काल भुगतान और सरकारी विद्यालयों में उर्दू एवं संस्कृत शिक्षकों की पदस्थापना की मांग की थी।
कुल मिलाकर आरजेडी का ताजा फैसला सिर्फ संगठन की इकाइयों को भंग करने तक सीमित नहीं दिख रहा है। इसके पीछे पार्टी की रणनीति संगठन में नए चेहरों को जगह देने और जमीन पर सक्रिय कार्यकर्ताओं को आगे लाने की भी नजर आ रही है।

अब देखना दिलचस्प होगा कि जब नई संगठनात्मक संरचना तैयार होगी, तो उसमें कौन-कौन से चेहरे दिखाई देंगे। क्या आरजेडी वाकई पढ़े-लिखे और संघर्षशील युवाओं को बड़ी जिम्मेदारी देगी? क्या पुराने नेताओं की जगह नए चेहरों को मौका मिलेगा? और सबसे बड़ा सवाल—क्या संगठन में यह बदलाव आने वाले चुनावों में आरजेडी के लिए राजनीतिक फायदा लेकर आएगा? इन सवालों का जवाब आने वाले दिनों में पार्टी की नई संगठनात्मक टीम सामने आने के बाद ही साफ होगा। फिलहाल इतना जरूर है कि आरजेडी ने संगठन को रीसेट करने का फैसला कर बिहार की राजनीति में एक नया संदेश दे दिया है।





