खबर डोज़ ब्यूरो। भाद्रपद पूर्णिमा और आश्विन कृष्ण पक्ष के साथ ही 27 सितंबर 2026 से पितृ पक्ष का शुभारंभ हो चुका है। पूर्वजों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और श्रद्धा प्रकट करने वाले इन 16 दिनों में तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन का विशेष विधान है। इस दौरान पितरों के निमित्त अर्पित किए जाने वाले भोजन में सात्विकता और शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
पितृ पक्ष के दौरान भोजन की थाली में क्या शामिल किया जाए और किन सामग्रियों का प्रयोग वर्जित या शुभ माना जाता है, इसको लेकर प्राचीन सनातन शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध कर्म में सात्विक खाद्य पदार्थों के साथ-साथ श्रद्धालु के मन का भाव और भक्ति सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।
सात्विक व्यंजन और तर्पण में प्रयुक्त मुख्य सामग्रियां
श्राद्ध के दौरान बनने वाले भोजन में क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है, लेकिन कुछ सामग्रियां लगभग हर जगह समान रूप से उपयोग में लाई जाती हैं:
- दूध और चावल की खीर: श्राद्ध के भोजन में खीर को सबसे उत्तम और सात्विक माना गया है। गाय के दूध, चावल और चीनी या गुड़ से बनी खीर पितरों को अर्पित की जाती है।
- काले तिल का उपयोग: तर्पण और पिंडदान के दौरान काले तिल का होना अनिवार्य माना गया है। बिना काले तिल के किए गए तर्पण को पितर स्वीकार नहीं करते।
- चावल और जौ: पिंडदान के लिए मुख्य रूप से पके हुए चावल और जौ के आटे से पिंड बनाए जाते हैं। जौ को धार्मिक अनुष्ठानों में बेहद पवित्र माना गया है।
- उड़द की दाल और बड़े: उत्तर भारत और देश के कई हिस्सों में श्राद्ध भोजन में उड़द दाल के बड़े या दाल बनाने का विधान है, हालांकि यह कुल परंपरा पर निर्भर करता है।
- पूड़ी और सादी सब्जी: बिना लहसुन-प्याज के तैयार की गई पूड़ी और सात्विक सब्जी जैसे कद्दू, तरोई या आलू की सब्जी भोजन में परोसी जाती है।
सनातन परंपरा में माना जाता है कि पितृ पक्ष में बनने वाला भोजन अत्यधिक मसालेदार या तला-भुना नहीं होना चाहिए। भोजन बनाते समय शुद्धता और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है तथा पहला अंश अग्नि, गाय, कुत्ते, कौए और देवों के लिए निकाला जाता है।

मनुस्मृति, महाभारत और गरुड़ पुराण में वर्णित विधान
प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में पितृ कर्म से जुड़ी सामग्रियों का विशद वर्णन मिलता है। मनुस्मृति के तीसरे अध्याय में श्राद्ध तर्पण के संदर्भ में जल, अन्न, दूध, फल और कंदमूल का उल्लेख किया गया है। ग्रंथ में स्पष्ट कहा गया है कि तिल, चावल, जौ और उड़द से किया गया अर्पण पितरों को तृप्ति प्रदान करता है।
इसी तरह महाभारत के अनुशासन पर्व में पितामह भीष्म और धर्मराज युधिष्ठिर के बीच संवाद के माध्यम से श्राद्ध विधि का वर्णन है। भीष्म पितामह बताते हैं कि पितृ कर्म में जल, तिल, जौ, चावल और सात्विक कंदमूल का अर्पण ही फलदायी होता है। गरुड़ पुराण में भी पिंडदान और तर्पण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए काले तिल और शुद्ध जल के प्रयोग को अनिवार्य बताया गया है।
शास्त्रकारों और धर्मचार्यों के अनुसार अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में श्राद्ध भोजन की परंपराएं भिन्न हो सकती हैं। अतः किसी भी सात्विक व्यंजन को बाध्यकारी मानने के बजाय अपने कुल की परंपरा के अनुसार शुद्ध भाव से पितरों का स्मरण करते हुए अन्न-जल अर्पित करना ही पितृ ऋण से मुक्ति का मार्ग माना गया है।





