पटना (खबर डोज़ ब्यूरो)। बिहार में आगामी पंचायत चुनावों की सरगर्मियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि अगली बार गांवों का राजनीतिक नक्शा कैसा होगा। राज्य में साल 2026 में पंचायत चुनाव होने हैं, लेकिन सरकार ने साफ कर दिया है कि चुनाव से पहले पंचायतों का परिसीमन किया जाएगा। इस प्रक्रिया के कारण न सिर्फ चुनावी तारीखें अनिश्चित हो गई हैं, बल्कि पंचायतों की सीमाओं और आरक्षण रोस्टर में बदलाव की आशंका से मौजूदा प्रतिनिधियों की चिंताएं भी बढ़ गई हैं।
परिसीमन और आरक्षण को लेकर क्यों मची है हलचल
बिहार में फिलहाल 8,053 ग्राम पंचायतें, 533 पंचायत समितियां और 38 जिला परिषद क्षेत्र काम कर रहे हैं। पिछली बार ये चुनाव 2021 में संपन्न हुए थे, जिसके बाद नियमानुसार अगला चुनाव 2026 में होना है। बीते 21 सितंबर को पटना में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने स्पष्ट किया था कि अगला पंचायत चुनाव परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही कराया जाएगा। सरकार का तर्क है कि कई पंचायतों की आबादी और क्षेत्रफल में भारी बढ़ोतरी हुई है, इसलिए प्रशासनिक सुविधा के लिए उन्हें नए सिरे से व्यवस्थित करना जरूरी है।

लेकिन इस कवायद ने संभावित उम्मीदवारों और वर्तमान जनप्रतिनिधियों की नींद उड़ा दी है। अगर परिसीमन होता है, तो कई पंचायतों का भूगोल बदल जाएगा, जिससे पुराना चुनावी गणित पूरी तरह बिखर सकता है। इसके अलावा सबसे बड़ा असमंजस आरक्षण रोस्टर को लेकर है। यदि वार्ड या पंचायतों की श्रेणियां बदलती हैं, तो सामान्य सीटें आरक्षित हो सकती हैं और आरक्षित सीटें सामान्य श्रेणी में जा सकती हैं।
प्रतिनिधियों की चिंताएं और स्थानीय स्तर पर मांग
पुनपुन प्रखंड की लखना पूर्वी पंचायत के मुखिया पति सिद्धेश्वर पासवान का कहना है कि परिसीमन के बाद पंचायत की स्थिति और सीट के आरक्षण को लेकर संशय बना हुआ है। उन्होंने मांग की है कि तमाम बदलावों के बावजूद चुनाव समय पर होने चाहिए, क्योंकि चुनाव टलने से ग्रामीण विकास के काम प्रभावित होते हैं। वहीं सोनबाई पंचायत के पूर्व मुखिया वीरेंद्र कुमार का मानना है कि यदि नई पंचायतें बनती हैं और क्षेत्र छोटे होते हैं, तो जनता की पहुंच प्रतिनिधियों तक आसान हो जाएगी। हालांकि उनकी भी यही चिंता है कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद यदि चुनाव लंबा खिंचता है, तो विकास कार्यों की रफ्तार सुस्त पड़ सकती है।

मुजफ्फरपुर के मीनापुर प्रखंड की महदेइया पंचायत के मुखिया शिवजी साहनी ने परिसीमन के आधार पर सवाल उठाते हुए कहा है कि केवल 2011 की पुरानी जनगणना को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। पिछले वर्षों में आबादी में बड़ा बदलाव आया है, इसलिए नए आंकड़ों को ध्यान में रखना जरूरी है। गोपालगंज के माधोपुर पंचायत से धर्मेंद्र क्रांतिकारी का भी यही कहना है कि प्रशासनिक पुनर्गठन अपनी जगह है, लेकिन चुनाव समय पर कराने की दिशा में भी ठोस प्रयास होने चाहिए। फिलहाल, जब तक सरकार की ओर से परिसीमन और आरक्षण की तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं की जाती, तब तक ग्रामीण राजनीति में असमंजस का माहौल बना रहेगा।





