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बिहार की 30 सीटों पर कम अंतर से जीत और SIR पर सियासी घमासान

| Published: | Updated:
बिहार की 30 सीटों पर कम अंतर से जीत और SIR पर सियासी घमासान
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मुख्य बातें

  • बिहार की राजनीति में विधानसभा चुनाव के परिणामों को लेकर एक बार फिर बड़ा सियासी घमासान छिड़ गया है।
  • मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया और कई सीटों पर जीत-हार के बेहद कम अंतर को लेकर महागठबंधन ने निर्वाचन आयोग के कामकाज पर सवाल खड़े किए हैं।
  • विपक्षी दलों का दावा है कि इन तकनीकी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं ने चुनावी नतीजों को प्रभावित किया है, जिससे राज्य की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है।
  • विपक्षी दलों के नेताओं का मुख्य रूप से यह आरोप है कि जिन विधानसभा सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी था, वहां मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और मतदान के आंकड़ों में बाद में हुए संशोधनों से परिणामों पर असर पड़ा।

पटना (खबर डोज़ ब्यूरो)। बिहार की राजनीति में विधानसभा चुनाव के परिणामों को लेकर एक बार फिर बड़ा सियासी घमासान छिड़ गया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया और कई सीटों पर जीत-हार के बेहद कम अंतर को लेकर महागठबंधन ने निर्वाचन आयोग के कामकाज पर सवाल खड़े किए हैं। विपक्षी दलों का दावा है कि इन तकनीकी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं ने चुनावी नतीजों को प्रभावित किया है, जिससे राज्य की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है।

कम अंतर वाली सीटों और SIR पर विपक्ष के क्या हैं दावे

विपक्षी दलों के नेताओं का मुख्य रूप से यह आरोप है कि जिन विधानसभा सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी था, वहां मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और मतदान के आंकड़ों में बाद में हुए संशोधनों से परिणामों पर असर पड़ा। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, राज्य की 30 ऐसी विधानसभा सीटें चर्चा के केंद्र में हैं जहां विजेताओं को मिले वोटों की संख्या में मामूली अंतर रहा है। इनमें से 20 सीटें ऐसी हैं जहां जीतने वाले उम्मीदवारों के बीच वोटों का अंतर शून्य से नौ के बीच दर्ज किया गया, जबकि 10 अन्य सीटों पर यह अंतर 10 से 15 वोटों के दायरे में बताया गया है। इन सभी सीटों पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के विभिन्न दलों के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी।

बिहार की 30 सीटों पर कम अंतर से जीत और SIR पर सियासी घमासान

इन आंकड़ों के तहत कुछ खास सीटों पर समानता भी हैरान करने वाली रही है। कुढ़नी और राजगीर विधानसभा क्षेत्रों में विजेताओं को बिल्कुल समान रूप से 1,07,811 वोट मिले। इसके अलावा कुम्हरार और इस्लामपुर जैसी सीटों पर भी विजेताओं के मतों में केवल दो वोटों का अंतर देखा गया। शाहपुर, बरौली, छातापुर और बनमनखी जैसी अन्य सीटों पर भी वोटों की संख्या में इसी तरह की नजदीकी पाई गई है। हालांकि केवल कुल वोटों की समानता या कम अंतर होना किसी भी प्रकार की चुनावी गड़बड़ी का स्वतः प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन इसने राजनीतिक हलकों में चर्चा जरूर छेड़ दी है।

पोस्टल बैलेट और मतदान आंकड़ों में वृद्धि पर सवाल

राजद के कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव ने SIR प्रक्रिया को लेकर पहले के संदेह जताने वाले ऑडियो और वीडियो सार्वजनिक साझा किए हैं। वहीं कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता असितनाथ तिवारी ने मतदान समाप्त होने के बाद जारी अंतिम आंकड़ों में हुई मामूली वृद्धि को आधार बनाकर सवाल उठाए हैं। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि दूसरे चरण के मतदान के बाद कुल मतदान प्रतिशत में 0.18 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी, जिसके तहत लगभग 1,34,145 अतिरिक्त वोटों का अनुमान लगाया गया। उनका मानना है कि इतनी संख्या में जुड़े वोट कम अंतर वाली सीटों के परिणाम बदलने की क्षमता रखते थे।

दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मतदान के आंकड़ों में संशोधन या अंतिम रिपोर्टिंग में मामूली वृद्धि को सीधे तौर पर फर्जी मतदान या गड़बड़ी का सबूत नहीं कहा जा सकता। इसके लिए वास्तविक मतदान केंद्र के रिकॉर्ड और निर्वाचन आयोग के आधिकारिक दस्तावेजों के बीच किसी प्रमाणित विसंगति को सामने लाना आवश्यक होता है। बाराचट्टी और इमामगंज जैसी सीटों पर पोस्टल बैलेट की गिनती को लेकर भी महागठबंधन ने कम अंतर का हवाला देते हुए निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है। फिलहाल इन सभी दावों और counter-claims के बीच सच्चाई जानने के लिए आधिकारिक मतगणना रिकॉर्ड और पारदर्शी प्रशासनिक जांच ही एकमात्र माध्यम बचे हैं।

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