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PM-CM कुर्सी पर मंडराया खतरा,नया प्रस्ताव बवाल लाएगा!

By | Published: 07 Jul 2026, 10:50 AM
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PM-CM कुर्सी पर मंडराया खतरा,नया प्रस्ताव बवाल लाएगा!
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मुख्य बातें

  • Politics: प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जैसे बड़े संवैधानिक पदों को लेकर एक नया प्रस्ताव अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।
  • खबर है कि अगर कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री किसी गंभीर आपराधिक मामले में गिरफ्तार होने के बाद लगातार 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहता है, तो उसे अपना पद छ...
  • हालांकि, यह अभी सिर्फ एक प्रस्ताव है, कानून नहीं बना है।
  • बताया जा रहा है कि सरकार इसे मानसून सत्र में फिर से संसद के सामने रख सकती है।
Politics: प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जैसे बड़े संवैधानिक पदों को लेकर एक नया प्रस्ताव अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। खबर है कि अगर कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री किसी गंभीर आपराधिक मामले में गिरफ्तार होने के बाद लगातार 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहता है, तो उसे अपना पद छोड़ना पड़ सकता है। हालांकि, यह अभी सिर्फ एक प्रस्ताव है, कानून नहीं बना है। बताया जा रहा है कि सरकार इसे मानसून सत्र में फिर से संसद के सामने रख सकती है। अगर ऐसा होता है तो इस मुद्दे पर सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी बहस तय मानी जा रही है।

देश की सियासत में एक बार फिर बड़ा संवैधानिक मुद्दा चर्चा में है। जानकारी के मुताबिक, केंद्र सरकार आगामी मानसून सत्र में 130वां संविधान संशोधन विधेयक दोबारा संसद में पेश कर सकती है। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि अगर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री या राज्य मंत्री किसी गंभीर आपराधिक मामले में गिरफ्तार होने के बाद लगातार 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहते हैं, तो उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ सकता है।
हालांकि, केवल गिरफ्तारी होने से किसी का पद नहीं जाएगा। प्रस्ताव में साफ कहा गया है कि यह नियम तभी लागू होगा, जब मामला गंभीर अपराध का हो और उसमें पांच साल या उससे ज्यादा सजा का प्रावधान हो। साथ ही संबंधित व्यक्ति लगातार 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रहे।

सूत्रों के अनुसार, इस विधेयक की समीक्षा कर रही संसद की संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी इस प्रावधान को हटाने के पक्ष में नहीं है। बताया जा रहा है कि समिति 17 जुलाई को अपनी अंतिम रिपोर्ट को मंजूरी दे सकती है। इसके बाद सरकार इस रिपोर्ट के आधार पर मानसून सत्र में विधेयक को फिर से पेश कर सकती है। अगर ऐसा होता है तो संसद में इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जोरदार बहस देखने को मिल सकती है।

इस पूरे मामले की शुरुआत पिछले मानसून सत्र से जुड़ी हुई है। उस समय केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने आपराधिक कानूनों में बड़े बदलाव से जुड़े तीन महत्वपूर्ण विधेयक संसद में पेश किए थे। बाद में इन विधेयकों को विस्तार से जांच और समीक्षा के लिए संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया था।
अब समिति की रिपोर्ट आने के बाद इन प्रस्तावों पर आगे की कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है। इसी वजह से यह मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।

सरकार का कहना है कि लोकतंत्र में ऊंचे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए जवाबदेही और नैतिक आचरण बेहद जरूरी है। सरकार का तर्क है कि अगर कोई मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री किसी गंभीर आपराधिक मामले में लंबे समय तक जेल में रहता है, तो उसका पद पर बने रहना लोकतांत्रिक व्यवस्था और सुशासन की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता। सरकार मानती है कि इससे जनता का भरोसा मजबूत होगा और सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता बढ़ेगी।
वहीं, इस प्रस्ताव को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों की राय भी अलग है। इस प्रस्ताव के समर्थकों का कहना है कि इससे राजनीति में साफ-सुथरी छवि वाले लोगों को बढ़ावा मिलेगा और जवाबदेही की भावना मजबूत होगी।

दूसरी ओर, विरोध करने वाले नेताओं का कहना है कि जांच एजेंसियों के संभावित दुरुपयोग का खतरा भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका तर्क है कि अगर किसी राजनीतिक नेता को गलत तरीके से किसी मामले में फंसाकर लंबे समय तक जेल में रखा जाए, तो इसका इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए भी किया जा सकता है।


यानी इस प्रस्ताव को लेकर कानूनी और राजनीतिक दोनों तरह की बहस होना तय माना जा रहा है।
फिलहाल सबसे अहम बात यही है कि यह केवल एक प्रस्तावित विधायी प्रावधान है। अभी यह कानून नहीं बना है। इसे लागू होने के लिए संसद के दोनों सदनों से पारित होना होगा और इसके बाद जरूरी संवैधानिक प्रक्रिया भी पूरी करनी होगी। यानी अभी यह कहना सही नहीं होगा कि 30 दिन जेल में रहने पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री की कुर्सी अपने आप चली जाएगी। इस पर अंतिम फैसला संसद और संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होगा।
अब देखना दिलचस्प होगा कि मानसून सत्र में यह विधेयक पेश होता है या नहीं, और अगर पेश होता है तो संसद में इस पर कैसी बहस होती है।

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