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अनंत के लिए ललन क्यों बने संकटमोचक, 2019 की दुश्मनी से 2026 की मध्यस्थता तक की पूरी कहानी

| Published: | Updated:
अनंत के लिए ललन क्यों बने संकटमोचक, 2019 की दुश्मनी से 2026 की मध्यस्थता तक की पूरी कहानी
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मुख्य बातें

  • बिहार की राजनीति में रिश्ते कभी एक जैसे नहीं रहते और यहां समय के साथ सियासी समीकरण तेज़ी से बदलते हैं।
  • केंद्रीय मंत्री और जदयू के वरिष्ठ नेता ललन सिंह तथा मोकामा के विधायक अनंत सिंह के बीच का राजनीतिक सफर इसी बात की तस्दीक करता है।
  • एक वक्त था जब दोनों के बीच की दूरी जगजाहिर थी, लेकिन साल दर साल बदलते हालात ने इन दोनों नेताओं को अलग-अलग खेमों से निकालकर एक मंच पर ला खड़ा किया है।
  • अब साल 2026 में पार्टी के भीतर उपजे विवाद को सुलझाने में ललन सिंह की भूमिका इस रिश्ते के एक नए अध्याय को दर्शाती है।

खबर डोज़ ब्यूरो। बिहार की राजनीति में रिश्ते कभी एक जैसे नहीं रहते और यहां समय के साथ सियासी समीकरण तेज़ी से बदलते हैं। केंद्रीय मंत्री और जदयू के वरिष्ठ नेता ललन सिंह तथा मोकामा के विधायक अनंत सिंह के बीच का राजनीतिक सफर इसी बात की तस्दीक करता है। एक वक्त था जब दोनों के बीच की दूरी जगजाहिर थी, लेकिन साल दर साल बदलते हालात ने इन दोनों नेताओं को अलग-अलग खेमों से निकालकर एक मंच पर ला खड़ा किया है। अब साल 2026 में पार्टी के भीतर उपजे विवाद को सुलझाने में ललन सिंह की भूमिका इस रिश्ते के एक नए अध्याय को दर्शाती है।

मुंगेर की सियासी टक्कर से लेकर लोकसभा चुनाव के प्रचार तक

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान दोनों नेताओं के बीच सीधा राजनीतिक मुकाबला देखने को मिला था। मुंगेर लोकसभा सीट पर जदयू ने ललन सिंह को मैदान में उतारा था, जबकि उनके मुकाबले अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रही थीं। हालांकि उस चुनाव में नीलम देवी को हार का सामना करना पड़ा था, जिससे दोनों के बीच की राजनीतिक दूरी साफ नजर आ रही थी। लेकिन वक्त बीतने के साथ यह तल्खी कम होती गई।

अनंत के लिए ललन क्यों बने संकटमोचक, 2019 की दुश्मनी से 2026 की मध्यस्थता तक की पूरी कहानी

वर्ष 2024 के आम चुनाव में यह बदलाव पूरी तरह से सतह पर आ गया। जब अनंत सिंह को जेल से पैरोल पर रिहाई मिली, तो उन्होंने घर बैठने के बजाय मुंगेर में ललन सिंह के पक्ष में जोरदार प्रचार किया और कई इलाकों में रोड शो भी किए। मोकामा क्षेत्र में अनंत सिंह के इस प्रभाव का सीधा फायदा ललन सिंह को मिला और उन्होंने चुनाव में जीत दर्ज की। इसके बाद साल 2025 के विधानसभा चुनाव में जब अनंत सिंह दुलारचंद यादव हत्याकांड मामले में जेल में थे, तब ललन सिंह खुद मोकामा पहुंचे और जदयू उम्मीदवार के पक्ष में मोर्चा संभालते हुए घर-घर जाकर वोट की अपील की थी।

साल 2026 में पुरानी तान और ललन सिंह की मध्यस्थता की भूमिका

राजनीतिक समीकरण भले ही सुधरे हों, लेकिन जदयू के भीतर गुटीय समीकरण पूरी तरह शांत नहीं हुए हैं। अनंत सिंह और पार्टी नेता नीरज कुमार के बीच तल्खी लंबे समय से चली आ रही है। साल 2026 में पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव को लेकर एक बार फिर यह विवाद सामने आया, जब अनंत सिंह ने पार्टी उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ बागी रुख अपना लिया। इस अंदरूनी कलह से पार्टी के भीतर असहज स्थिति पैदा हो गई।

अनंत के लिए ललन क्यों बने संकटमोचक, 2019 की दुश्मनी से 2026 की मध्यस्थता तक की पूरी कहानी

पार्टी सूत्रों के अनुसार, इस गंभीर विवाद को सुलझाने के लिए पार्टी आलाकमान ने पहल की। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ विचार-विमर्श के बाद जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने मामले के समाधान की जिम्मेदारी ललन सिंह को सौंपी। शुरुआत में ललन सिंह इस मामले से दूरी बनाते नजर आए थे, लेकिन बाद में पार्टी हित को देखते हुए उन्होंने मध्यस्थता की जिम्मेदारी संभाली। यह घटनाक्रम साबित करता है कि बिहार की सियासत में व्यक्तिगत रिश्ते और क्षेत्रीय प्रभाव वक्त के साथ किस तरह नए राजनीतिक आयाम तय करते हैं।

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