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बिहार में 60 घंटे का लॉकडाउन,लोग खुद को घरों में कर लेते हैं कैद

| Published: | Updated:
बिहार में 60 घंटे का लॉकडाउन,लोग खुद को घरों में कर लेते हैं कैद
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मुख्य बातें

  • पश्चिम चंपारण का थारू आदिवासी समाज पर्यावरण संरक्षण की एक बेहद अनूठी और सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन कर रहा है।
  • यहां बरना पर्व के दौरान कई गांवों में 48 से 60 घंटे तक लोग स्वेच्छा से अपने घरों के भीतर ही कैद रहते हैं।
  • इस दौरान सामान्य आवाजाही और रोजमर्रा की तमाम बाहरी गतिविधियां पूरी तरह रोक दी जाती हैं ताकि नई उगी वनस्पतियों और पेड़-पौधों को कोई नुकसान न पहुंचे।
  • प्रकृति के प्रति इस अटूट समर्पण और अनुशासन की इस अनूठी मिसाल की चर्चा देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में कर चुके हैं।

पश्चिम चंपारण (खबर डोज़ ब्यूरो)। पश्चिम चंपारण का थारू आदिवासी समाज पर्यावरण संरक्षण की एक बेहद अनूठी और सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन कर रहा है। यहां बरना पर्व के दौरान कई गांवों में 48 से 60 घंटे तक लोग स्वेच्छा से अपने घरों के भीतर ही कैद रहते हैं। इस दौरान सामान्य आवाजाही और रोजमर्रा की तमाम बाहरी गतिविधियां पूरी तरह रोक दी जाती हैं ताकि नई उगी वनस्पतियों और पेड़-पौधों को कोई नुकसान न पहुंचे। प्रकृति के प्रति इस अटूट समर्पण और अनुशासन की इस अनूठी मिसाल की चर्चा देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में कर चुके हैं।

बिहार में 60 घंटे का लॉकडाउन,लोग खुद को घरों में कर लेते हैं कैद

60 घंटे तक गांवों में रहता है पूरी तरह सन्नाटा

थारू समाज के इस बरना पर्व को प्रकृति की रक्षा से जोड़कर देखा जाता है। पर्व के नियमों के तहत गांव में लोगों के आने-जाने पर सख्त पाबंदी होती है और कोई भी ग्रामीण अपने घर से बाहर कदम नहीं रखता। मान्यता है कि इंसानी आवाजाही और रोजमर्रा की गतिविधियों से नई वानस्पतिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए समाज के सभी लोग सामूहिक रूप से इन नियमों का पूरी निष्ठा के साथ पालन करते हैं।

इस परंपरा की सबसे बड़ी खूबी इसकी पूर्व तैयारी है। पर्व शुरू होने से पहले ही ग्रामीण अपने घरों में खाने-पीने की जरूरी सामग्री और मवेशियों के चारे का पुख्ता इंतजाम कर लेते हैं। इससे बरना की अवधि के दौरान किसी भी व्यक्ति को घर से बाहर निकलने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। पर्व की शुरुआत पारंपरिक पूजा-पाठ के साथ होती है, जिसमें समाज के लोग पूरी आस्था के साथ प्रकृति का आभार जताते हैं और इसके समापन पर पारंपरिक गीत-संगीत व नृत्य के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

बिहार में 60 घंटे का लॉकडाउन,लोग खुद को घरों में कर लेते हैं कैद

पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक एकजुटता का संदेश

यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामुदायिक एकजुटता और अनुशासन का भी एक बड़ा उदाहरण पेश करता है। आधुनिक दौर में जब पर्यावरण संरक्षण के लिए बड़े-बड़े अभियान चलाए जा रहे हैं, तब थारू समाज की यह परंपरा यह साबित करती है कि प्रकृति के प्रति जवाबदेही हमारी जीवनशैली का हिस्सा बन सकती है। कुछ घंटों के लिए अपनी सामान्य दिनचर्या को पूरी तरह रोक देना और नई हरियाली को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास करना इस पर्व की असली पहचान है।

बिहार राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष शैलेंद्र गढ़वाल का कहना है कि बरना केवल एक धार्मिक आयोजन भर नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने की एक सामूहिक परंपरा है। इसमें ग्रामीण अपनी दैनिक दिनचर्या को विराम देकर पर्यावरण संरक्षण का कड़ा संदेश देते हैं। बरना की यह अनूठी परंपरा आने वाली पीढ़ियों को भी प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने का मार्ग दिखाती है। पश्चिम चंपारण के थारू समाज के लिए यह जीवनशैली का अभिन्न अंग है।

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