तारीख थी 2 अप्रैल 2011 और मुंबई का वानखेड़े स्टेडियम, जहाँ महेंद्र सिंह धोनी ने छक्का लगाकर भारत को 28 साल बाद विश्व विजेता बनाया था। आज साल 2026 में वही 'थाला' क्रिकेट की चकाचौंध से दूर झारखंड की माटी के बीच अपने खेतों में ट्रैक्टर चलाते नजर आते हैं।

क्रिकेट के शिखर से लेकर रांची के खेतों की पगडंडियों तक का यह सफर एक खिलाड़ी के अपनी जड़ों की ओर लौटने की कहानी है। खड़गपुर रेलवे स्टेशन पर टीटीई की नौकरी से लेकर मैदान के कड़े फैसलों और ईजा फार्म्स तक, माही का जीवन संघर्ष और सादगी की मिसाल रहा है।

रेलवे की नौकरी छोड़ चुनी अनिश्चितता की राह
आज धोनी की सफलता सभी को दिखती है, लेकिन इसकी नींव एक असमंजस भरे दौर में रखी गई थी। रांची के एक आम लड़के, जिनके पिता पंप ऑपरेटर थे, उन्होंने परिवार की सुरक्षा के लिए खड़गपुर रेलवे स्टेशन पर टीटीई की नौकरी ज्वाइन की थी। काले कोट में टिकट चेक करना और हर दिन हजारों अजनबियों की भीड़ के बीच काम करना धोनी के लिए घुटन भरा हो गया था। एक रात खड़गपुर रेलवे क्वार्टर के पास रेलवे ट्रैक के किनारे बैठकर उन्होंने बिना किसी बैकअप प्लान के रेलवे की नौकरी को अलविदा कह दिया और पूरी तरह क्रिकेट पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया।

मैदान के कड़े फैसले और ऐतिहासिक जीत
कप्तान के तौर पर धोनी ने हमेशा देश को सर्वोपरि रखा और कई साहसिक फैसले लिए। साल 2008 की सीबी सीरीज के दौरान उन्होंने चयनकर्ताओं से साफ कह दिया कि उन्हें टीम में कुछ सीनियर खिलाड़ियों की जगह युवा और फुर्तीले फील्डर्स चाहिए। इसके अलावा 2011 के विश्व कप फाइनल में जब सचिन और सहवाग आउट हो चुके थे, तब इन-फॉर्म युवराज सिंह के बजाय धोनी खुद नंबर 5 पर बल्लेबाजी करने उतरे। उन्होंने कोच गैरी कर्स्टन से कहा कि आईपीएल में उन्होंने मुरलीधरन को नेट पर हजारों बार खेला है, और एक ऑफ-स्पिनर के सामने राइट-हैंडर का होना जरूरी है। धोनी की इस सूझबूझ भरी 91 रनों की नाबाद पारी ने भारत को विश्व कप जिताया।

जर्सी नंबर 7 और स्टंप्स का अनोखा रिटायरमेंट प्लान
लोगों को अक्सर लगता था कि धोनी का जर्सी नंबर 7 किसी अंधविश्वास के कारण है, लेकिन एक इंटरव्यू में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका जन्म 7 जुलाई को हुआ था और साल का 7वां महीना होने के कारण उन्होंने यह नंबर चुना था। इसके अलावा, मैच जीतने के बाद धोनी के विकेट से स्टंप उखाड़ने के पीछे एक खास भावना जुड़ी थी। उन्होंने बताया कि वे इन स्टंप्स पर मैच की तारीख नहीं लिखते हैं, ताकि बुढ़ापे में वे इन स्टंप्स को देखकर पुरानी यादों को ताजा कर सकें।

चकाचौंध से दूर रांची में 'ईजा फार्म्स' की शुरुआत
15 अगस्त 2020 की शाम को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहने के बाद धोनी रांची लौट आए। रांची के सेंबो इलाके में लगभग 43 एकड़ में फैला उनका फार्महाउस 'ईजा फार्म्स' (Eeja Farms) कहलाता है, जहां 'ईजा' का कुमाऊंनी भाषा में अर्थ 'माँ' होता है। लॉकडाउन के दौरान धोनी के ट्रैक्टर चलाकर खेतों की जुताई करने के वीडियो सामने आए थे। उनके खेतों में विदेशी ब्रोकली, शिमला मिर्च, टमाटर, स्ट्रॉबेरी और पपीते की ऑर्गेनिक खेती होती है, जिनकी सब्जियां रांची के स्थानीय बाजारों में कम दामों पर बेची जाती हैं।

पशुपालन और बेजुबानों से प्रेम
खेती के साथ-साथ धोनी ने पशुपालन को भी बढ़ावा दिया है। उन्होंने मध्य प्रदेश के झाबुआ से 'कड़कनाथ' नस्ल के काले मुर्गे मंगाए और पंजाब की 'साहिवाल' व फ्रांस की 'फ्रीजियन' नस्ल की गायें पाली हैं, जिनका शुद्ध दूध स्थानीय लोगों तक पहुंचता है। उनके फार्महाउस में जर्मन शेफर्ड, लैब्राडोर और रॉटवीलर जैसे कुत्ते, 'चेतक' नामक मारवाड़ी घोड़ा और स्कॉटलैंड से मंगाया गया एक शेटलैंड पोनी भी है। धोनी का यह जीवन यह साबित करता है कि सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचने के बाद भी जमीन से जुड़े रहना कितना महत्वपूर्ण है।






