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NEET Paper Leak: जब पेपर लीक के खिलाफ लाठियां खाकर अस्पताल पहुंचे थे धर्मेंद्र प्रधान

By | Published: 23 Jul 2026, 01:03 PM
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NEET Paper Leak: जब पेपर लीक के खिलाफ लाठियां खाकर अस्पताल पहुंचे थे धर्मेंद्र प्रधान
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मुख्य बातें

  • नई दिल्ली: देश में NEET-UG पेपर लीक और परीक्षाओं में धांधली को लेकर संसद से लेकर सड़क तक घमासान मचा हुआ है।
  • विपक्षी दल लगातार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की नैतिक जिम्मेदारी तय करते हुए उनके इस्तीफे की मांग पर अड़े हुए हैं।
  • हालांकि, भारतीय राजनीति के पन्नों को पलटने पर एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है सबको चौंका दिया है।
  • आज से 29 साल पहले, साल 1997 में, यही धर्मेंद्र प्रधान एक छात्र नेता के तौर पर राज्य सरकार के खिलाफ पेपर लीक के मुद्दे को लेकर सड़कों पर उतरे थे और पुलिस की बर्बर लाठिय...

नई दिल्ली: देश में NEET-UG पेपर लीक और परीक्षाओं में धांधली को लेकर संसद से लेकर सड़क तक घमासान मचा हुआ है। विपक्षी दल लगातार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की नैतिक जिम्मेदारी तय करते हुए उनके इस्तीफे की मांग पर अड़े हुए हैं। हालांकि, भारतीय राजनीति के पन्नों को पलटने पर एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है सबको चौंका दिया है। आज से 29 साल पहले, साल 1997 में, यही धर्मेंद्र प्रधान एक छात्र नेता के तौर पर राज्य सरकार के खिलाफ पेपर लीक के मुद्दे को लेकर सड़कों पर उतरे थे और पुलिस की बर्बर लाठियों का शिकार होकर अस्पताल पहुंचे थे।

आज जब नीट विवाद को लेकर जंतर-मंतर से लेकर संसद के दोनों सदनों तक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, तब 1997 का वह ओडिशा आंदोलन एक बार फिर देश के राजनीतिक गलियारों के केंद्र में आ गया है। उस समय और आज के हालात में सबसे बड़ा अंतर यह है कि तब धर्मेंद्र प्रधान विपक्ष में खड़े होकर छात्र हित की आवाज उठा रहे थे, जबकि 2026 में वे देश के शिक्षा मंत्री के पद पर आसीन हैं और विपक्ष उनसे जवाब मांग रहा है।


1997 का भुवनेश्वर आंदोलन: जब सचिवालय घेराव में टूटी थीं धर्मेंद्र प्रधान की हड्डियां

बात साल 1997 की है, जब ओडिशा में कांग्रेस की सरकार थी और जानकी वल्लभ पटनायक राज्य के मुख्यमंत्री थे। उस दौरान ओडिशा में एक बड़े परीक्षा प्रश्नपत्र लीक का मामला जोर-शोर से गरमाया हुआ था। उस समय 28 साल के धर्मेंद्र प्रधान उत्कल यूनिवर्सिटी से एंथ्रोपोलॉजी (मानव विज्ञान) की पढ़ाई कर रहे थे और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के राष्ट्रीय सचिव थे।

पेपर लीक के विरोध में धर्मेंद्र प्रधान के नेतृत्व में लगभग 1,500 छात्रों के एक बड़े समूह ने भुवनेश्वर स्थित राज्य सचिवालय का घेराव किया था। प्रदर्शन के दौरान स्थिति बिगड़ने पर पुलिस ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज कर दिया। इस लाठीचार्ज में धर्मेंद्र प्रधान गंभीर रूप से घायल हो गए थे और उनके शरीर की कई हड्डियां टूट गई थीं, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

उस दौर को याद करते हुए धर्मेंद्र प्रधान के तत्कालीन जूनियर साथी और वर्तमान में आरएमडी (RMD) डिग्री कॉलेज के प्रधानाचार्य प्रशांत राउत बताते हैं कि उस आंदोलन के दौरान सभी छात्र काफी डरे हुए थे। उन्होंने बताया कि उस प्रदर्शन में धर्मेंद्र प्रधान को पुलिस ने बहुत बुरी तरह पीटा था, जिससे उन्हें शरीर में कई जगह गंभीर फ्रैक्चर आए थे। प्रशांत राउत के अनुसार, छात्र राजनीति के उस दौर में धर्मेंद्र प्रधान पर जानलेवा हमले भी हुए थे और वे महज अपनी किस्मत की वजह से उस वक्त बच पाए थे।


छात्र राजनीति से केंद्रीय मंत्रिमंडल तक का सफर

धर्मेंद प्रधान ने महज 18 साल की उम्र में छात्र राजनीति के क्षेत्र में कदम रखा था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के छात्र संगठन एबीवीपी में उन्होंने एक बेहद सक्रिय आयोजक के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। साल 1994 से लेकर 1997 के बीच वे दो बार एबीवीपी के राष्ट्रीय सचिव के पद पर रहे।

1997 के इस ऐतिहासिक छात्र आंदोलन और विरोध-प्रदर्शन के बाद धर्मेंद्र प्रधान औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गए। संगठन निर्माण में उनकी क्षमता और मेहनत के चलते उन्होंने ओडिशा में भाजपा की जड़ों को काफी मजबूत किया। उनके इस संगठनात्मक प्रयास का ऐतिहासिक परिणाम साल 2024 में देखने को मिला, जब भाजपा ने ओडिशा में नवीन पटनायक के 24 साल लंबे बीजू जनता दल (BJD) के शासन को समाप्त करते हुए पहली बार अपनी स्वतंत्र सरकार बनाई।

केंद्रीय राजनीति में आने के बाद धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल में पेट्रोलियम और कौशल विकास जैसे कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार संभाला। इसके बाद, साल 2021 में उन्हें देश का केंद्रीय शिक्षा मंत्री नियुक्त किया गया।


1997 से 2026: बदल गए किरदार, संसद से जंतर-मंतर तक मचा घमासान

साल 1997 से लेकर 2026 तक के 29 वर्षों के सफर में इतिहास का चक्र पूरी तरह घूम चुका है। घटना का विषय आज भी 'पेपर लीक' ही है, लेकिन धर्मेंद्र प्रधान की भूमिका पूरी तरह से बदल चुकी है:

  • 1997 की भूमिका: धर्मेंद्र प्रधान 28 साल के छात्र नेता के रूप में ओडिशा की तत्कालीन राज्य सरकार के खिलाफ पेपर लीक मुद्दे पर सड़क पर उतरकर लाठियां खा रहे थे।
  • 2026 की भूमिका: धर्मेंद्र प्रधान देश के केंद्रीय शिक्षा मंत्री हैं और विपक्ष उनसे नीट परीक्षा में धांधली की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद से इस्तीफे की मांग कर रहा है।

संसद के चालू मानसून सत्र में विपक्ष ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्री को पूरी तरह से घेर रखा है। राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने स्पष्ट रूप से कहा है कि नीट और परीक्षा धांधली जैसे गंभीर विषय पर किसी भी निष्पक्ष चर्चा की शुरुआत तभी संभव है, जब शिक्षा मंत्री अपने पद से इस्तीफा दें।

दूसरी तरफ, सरकार की ओर से बचाव करते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता व केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने स्थिति साफ की है। उनका कहना है कि सरकार के पास इस मामले में छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है। सरकार मानसून सत्र के दौरान संसद में नीट से जुड़े प्रत्येक सवाल और चर्चा का उत्तर देने के लिए पूरी तरह से तैयार है। 1997 का वह आंदोलन इस तथ्य का प्रत्यक्ष गवाह है कि भारत में छात्र आंदोलनों और पेपर लीक जैसे ज्वलंत मुद्दों ने हमेशा देश की राजनीतिक दिशा को तय करने में मुख्य भूमिका निभाई है।

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