पटना (खबर डोज़ ब्यूरो)। बिहार में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की तैयारी कर रहे संभावित उम्मीदवारों को अभी और इंतजार करना पड़ सकता है। राज्य में होने वाले आगामी पंचायत चुनाव तय समय पर होते नजर नहीं आ रहे हैं। पंचायत चुनाव की प्रक्रिया में देरी की मुख्य वजह पंचायतों और वार्डों का नए सिरे से परिसीमन, नए प्रशासनिक नियम, आरक्षण रोस्टर और कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा किया जाना है। प्रशासनिक स्तर पर चल रही इन तैयारियों के कारण चुनाव कार्यक्रम के अगले साल यानी 2027 तक खिसकने के पूरे आसार बन रहे हैं, जिससे ग्रामीण राजनीति में सरगर्मी तेज हो गई है।
साढ़े सात हजार की आबादी पर नई पंचायतों का गठन
बिहार में पंचायतों की मौजूदा व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी चल रही है। सरकारी योजना के अनुसार करीब 7,500 की आबादी के मानक के आधार पर नई पंचायतों का गठन किया जा रहा है। इसका सीधा असर प्रदेश की पंचायतों की कुल संख्या, उनके भौगोलिक क्षेत्र और वार्डों की संरचना पर पड़ रहा है। आने वाले दिनों में कई पुरानी पंचायतों की सीमाएं बदल सकती हैं और कुछ का क्षेत्र छोटा या बड़ा हो सकता है। नई पंचायतों के वजूद में आने से कई ग्रामीण इलाकों में नए नेतृत्व के लिए रास्ते खुलेंगे, जिससे स्थानीय राजनीतिक समीकरण भी पूरी तरह प्रभावित होंगे।
परिसीमन का यह पूरा फेरबदल केवल नक्शों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे मतदाताओं का पूरा समीकरण भी बदल रहा है। जो मतदाता और वार्ड अब तक किसी एक पंचायत का हिस्सा रहे हैं, वे नई व्यवस्था में किसी अन्य पंचायत में शामिल हो सकते हैं। इससे उन भावी प्रत्याशियों की रणनीति पर पानी फिरता दिख रहा है जो लंबे समय से क्षेत्र में सक्रिय रहकर चुनावी जमीन तैयार कर रहे थे। अब सीमाएं तय होने के बाद उम्मीदवारों को नए सिरे से अपनी रणनीति बनानी होगी और नए मतदाताओं के बीच पैठ बनानी पड़ेगी।

आरक्षण रोस्टर और आयोग की रिपोर्ट का इंतजार
पंचायत चुनाव में देरी की दूसरी बड़ी वजह नया आरक्षण रोस्टर है। इस बार के चुनाव नए आरक्षण नियमों और तीसरे चक्र के पदवार आरक्षण के आधार पर कराए जाने की पूरी तैयारी है। इसका सीधा अर्थ यह है कि जिन पंचायतों या पदों पर पिछले दो लगातार चक्रों से आरक्षण चला आ रहा था, वहां इस बार स्थिति बदल सकती है। कई आरक्षित सीटें सामान्य वर्ग के लिए खुल सकती हैं, जबकि कुछ अन्य सीटें नए नियमों के तहत अलग-अलग श्रेणियों के लिए आरक्षित की जा सकती हैं।

इस पूरी प्रक्रिया में पिछड़े वर्ग के आरक्षण से जुड़ी औपचारिकताएं भी शामिल हैं। इसके लिए गठित डेडिकेटेड कमीशन यानी समर्पित आयोग की रिपोर्ट और उसके आधार पर जरूरी सरकारी मंजूरियों की प्रक्रिया का चरणबद्ध तरीके से पूरा होना अनिवार्य है। प्रशासनिक स्तर पर परिसीमन की आपत्तियों का निपटारा, वार्डों का निर्धारण, नया आरक्षण रोस्टर तैयार करना और उसकी अंतिम मंजूरी मिलने में समय लग रहा है। जब तक यह सभी प्रशासनिक चरण पूरे नहीं होते और सरकार की ओर से आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की जाती, तब तक चुनाव की सही तारीखों को लेकर असमंजस बना रहेगा।





