Bihar: 21000 करोड़ का लोन लेने जा रही है सम्राट सरकार, लोन लेकर होगा बिहार का विकास। बनाए जाएंगे लंबे-लंबे पुल, बांधे जाएंगे सरकार के तारीफों के भी पोल। लेकिन इसके पीछे की असलियत इस खबर में आपको हम बताएंगे की कैसे बिहार के विकास के लिए अब लोन लेना पड़ रहा है और सड़कों का जाल तो बिछेगा लेकिन इस लोन को चुकता करने के लिए आम जनता की पॉकेट से भी किस तरह पैसा निकाला जाएगा यह समझने के लिए आप काफी समझदार होंगे।

जी हां, बिहार सरकार ने सड़क और पुल बनाने के लिए 21 हजार करोड़ रुपये का बड़ा लोन लेने का फैसला किया है। सरकार का कहना है कि इससे विकास की रफ्तार तेज होगी। लेकिन सवाल यह है कि जब विकास लोन के भरोसे होगा, तो आखिर इस लोन की किस्त कौन भरेगा? सरकार... या फिर आम जनता?

बिहार में अब विकास की गाड़ी बैंक के पैसों से दौड़ेगी। पथ निर्माण विभाग ने 21 हजार करोड़ रुपये का लोन लेने की मंजूरी दे दी है। सरकार का दावा है कि अब पैसों की कमी की वजह से कोई सड़क या पुल का काम नहीं रुकेगा।
इस 21 हजार करोड़ रुपये में से 15 हजार करोड़ रुपये बिहार स्टेट रोड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन यानी BSRDCL को दिए जाएंगे। वहीं 6 हजार करोड़ रुपये बिहार राज्य पुल निर्माण निगम को मिलेंगे। इन पैसों से उत्तर बिहार समेत कई बड़े प्रोजेक्ट पूरे किए जाएंगे। लोन तो बैंक दे देगा, लेकिन बैंक कोई रिश्तेदार नहीं होता जो पैसा देकर भूल जाए। यह पैसा ब्याज समेत वापस भी करना होगा। सरकार ने साफ कर दिया है कि यह लोन 25 साल में चुकाया जाएगा।

पैसा आएगा कहां से?
इसका जवाब भी सरकार ने दे दिया है। सड़कों और पुलों पर जो टोल टैक्स वसूला जाएगा, उसी पैसे से इस लोन की किस्त चुकाई जाएगी। यानी आज सड़क बनेगी, कल उस सड़क पर चलने वाला आम आदमी टोल देगा, और उसी टोल से बैंक का कर्ज उतरेगा।
सीधी भाषा में कहें तो सड़क आपकी, सफर आपका, टोल आपका... और बैंक की किस्त भी आपके ही पैसे से।

अब सरकार का पक्ष भी समझ लेते हैं।
तो अगर सड़कें अच्छी होंगी, पुल मजबूत होंगे और जाम कम होगा, तो लोगों का समय बचेगा, कारोबार बढ़ेगा और यात्रा आसान होगी। ऐसे में सरकार का कहना है कि यह लोन खर्च नहीं बल्कि भविष्य में निवेश है। लेकिन दूसरी तरफ विपक्ष और कई जानकार सवाल उठा रहे हैं कि अगर राज्य की आर्थिक स्थिति मजबूत होती, तो क्या इतनी बड़ी रकम उधार लेने की जरूरत पड़ती? क्या सरकार के पास अपने संसाधन इतने कम पड़ गए कि विकास के लिए भी बैंक का दरवाजा खटखटाना पड़ा?
अब बात करते हैं मुजफ्फरपुर की, जहां इस फैसले का सबसे ज्यादा असर देखने को मिलेगा।
अखाड़ाघाट पुल का निर्माण तेजी से होगा। दादर पुल का नया निर्माण आगे बढ़ेगा। पुराने दादर पुल की मरम्मत भी पूरी होगी। माड़ीपुर आरओबी की मरम्मत से शहर के लोगों को जाम से राहत मिलने की उम्मीद है। इतना ही नहीं, पारू प्रखंड के फतेहाबाद में बूढ़ी गंडक नदी पर करीब 3 किलोमीटर लंबा महासेतु भी बनाया जाएगा। इस पुल पर करीब 5 अरब रुपये खर्च होने का अनुमान है। अगर यह समय पर बन गया, तो आसपास के हजारों लोगों की यात्रा काफी आसान हो जाएगी। एक और बड़ी राहत उन किसानों के लिए है जिनकी जमीन सड़क निर्माण के लिए ली गई है। हथौड़ी-अतरार-बभनगामा-औराई सड़क परियोजना के लिए जिन लोगों की जमीन अधिग्रहित हुई है,उन्हें बैंक से पैसा आते ही मुआवजा देने की प्रक्रिया तेज होगी।
अब आखिर में सबसे बड़ा सवाल
अगर विकास के लिए लोन लिया जा रहा है और उससे सच में बेहतर सड़कें, मजबूत पुल और रोजगार के मौके बढ़ते हैं, तो लोग शायद इसे स्वीकार भी कर लें। लेकिन अगर सालों बाद भी सड़क अधूरी रही, पुल फाइलों में ही घूमते रहे और जनता सिर्फ टोल भरती रही, तो फिर सवाल उठेंगे कि आखिर 21 हजार करोड़ रुपये गए कहां? क्योंकि जनता को विकास चाहिए, सिर्फ कर्ज का बोझ नहीं। फिलहाल सरकार कह रही है कि बिहार बदलेगा, सड़कें चमकेंगी और पुल बनेंगे। अब यह विकास की नई कहानी बनेगी या कर्ज की पुरानी दास्तान, इसका जवाब आने वाले साल ही देंगे।





