महिलाओं से जुड़े एक आपराधिक मामले में पटना हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। शीर्ष अदालत ने न्यायिक संवेदनशीलता और ऐसे मामलों में तथ्यों तथा कानून की सावधानीपूर्वक समीक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया है।
बांका जिले के 2008 के मामले पर शीर्ष अदालत की टिप्पणी
महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के एक हालिया फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसे मामलों में फैसला लिखने से पहले पूरी रिसर्च और गंभीरता जरूरी है। यह मामला बिहार के बांका जिले का है। साल 2008 में एक युवती ने एक स्टूडियो संचालक पर जबरन रोकने और कथित यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। निचली अदालत ने मामले को दुष्कर्म के प्रयास से जुड़ा मानते हुए आरोपी को सजा सुनाई थी।

मेडिकल साक्ष्य और अदालती रुख
लेकिन 9 जुलाई को पटना हाई कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि मेडिकल सबूत की कमी और कुछ कानूनी कारणों की वजह से इस घटना को दुष्कर्म के प्रयास नहीं माना जा सकता। अदालत ने इसे महिला की लज्जा भंग करने का अपराध माना और आरोपी को दुष्कर्म के प्रयास के आरोप से राहत दे दी। जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो वहां इस फैसले पर कड़ी नाराजगी जताई गई। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि महिलाओं से जुड़े मामलों में अदालतों को बहुत सोच-समझकर फैसला देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे फैसले लिखने से पहले अच्छी तरह रिसर्च करना जरूरी है।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता ने भी अदालत का ध्यान एक पुराने मामले की ओर दिलाया। उन्होंने बताया कि पिछले साल इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी एक मामले में ऐसी ही टिप्पणी की थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया था। इसके बावजूद फिर ऐसा फैसला सामने आना चिंता की बात है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि किसी महिला की इच्छा के विरुद्ध की गई जबरदस्ती और अपराध की दिशा में उठाए गए ठोस कदमों का आकलन केवल तैयारी के रूप में नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में परिस्थितियों के आधार पर इसे दुष्कर्म के प्रयास माना जा सकता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों की जांच और सुनवाई के दौरान पुलिस और अदालतों को तय दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए। राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी की ओर से तैयार की गई गाइडलाइन और हैंडबुक का इस्तेमाल हर स्तर पर होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को भी निर्देश दिए कि थाने में एफआईआर दर्ज होने से लेकर चार्जशीट दाखिल होने तक हर अधिकारी जेंडर संवेदनशीलता का ध्यान रखे। जांच के दौरान पीड़िता के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाए और कानून के मुताबिक पूरी प्रक्रिया अपनाई जाए।
इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्टों से कहा कि महिलाओं से जुड़े मामलों के लिए बनाई गई गाइडलाइन और रिपोर्ट अपनी-अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध कराई जाए, ताकि न्यायिक अधिकारियों को सही दिशा मिल सके। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि इससे साफ संदेश गया है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामलों में केवल तकनीकी आधार पर फैसला नहीं होना चाहिए। अदालतों को यह भी देखना होगा कि घटना की गंभीरता क्या है और पीड़िता के अधिकारों की रक्षा कैसे की जाए। अब इस मामले की अगली सुनवाई और सुप्रीम कोर्ट के अंतिम आदेश पर सभी की नजर रहेगी। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई पर भी असर डाल सकता है और अदालतों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।





