क्या आपने कभी सोचा है कि कोई इंसान अपने जंगल, अपनी जमीन और अपनी संस्कृति को बचाने के लिए अपनी जान तक दांव पर लगा सकता है? सुनने में यह बात थोड़ी अलग लग सकती है, लेकिन मध्य प्रदेश के पन्ना और छतरपुर के जंगलों में रहने वाले कई आदिवासी समुदाय आज इसी लड़ाई को लड़ रहे हैं। उनका कहना है कि जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं है, बल्कि उनका घर, उनकी पहचान और उनकी पूरी जिंदगी है और यही वजह है कि लोग चिता आंदोलन पर उतारू हो गए हैं। गांव के सैकड़ों लोग जीते जी चिता पर लेट गए या तो मांग सुनी जाए या चिता जले।

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में, केन-बेतवा लिंक परियोजना के कारण विस्थापित हो रहे आदिवासियों और किसानों ने उचित मुआवजे और पुनर्वास की मांग को लेकर जुलाई में एक उग्र 'चिता आंदोलन' शुरू किया। यह प्रदर्शन 3 जुलाई से बराना नदी के पास कूपी गांव में चल रहा था। विरोध जताने के लिए प्रदर्शनकारी गले में फंदे और पानी में चिता जैसी अवस्था में लेट गए थे। इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर पिछले 14 दिनों से आमरण अनशन पर थे।यह उग्र होता प्रदर्शन 19 जुलाई की तड़के भारी पुलिस बल की कार्रवाई के बाद खत्म हो गया। पुलिस ने अमित भटनागर को अस्पताल में भर्ती कराया और अन्य प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर उनके गांवों में छोड़ दिया। प्रशासन का दावा है कि उन्होंने मुआवजा राशि बढ़ाकर 12.5 लाख रुपये प्रति परिवार कर दी है और वे कानूनन पुनर्वास कर रहे हैं, लेकिन आंदोलनकारियों का आरोप है कि उन्हें बिना उचित व्यवस्था के बेघर किया जा रहा है।
आदिवासी समुदाय सदियों से जंगलों के बीच रहकर अपना जीवन जीते आए हैं। उनका खाना, पीना, रोजगार, रीति-रिवाज और संस्कृति, सब कुछ जंगल से जुड़ा हुआ है। उनके लिए जंगल सिर्फ लकड़ी या जमीन नहीं है। यह उनके पूर्वजों की यादें हैं, उनकी परंपराएं हैं और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी।
लेकिन अब इन इलाकों में विकास परियोजनाओं और दूसरे कामों की वजह से बदलाव की बातें हो रही हैं। इसी बदलाव को लेकर आदिवासी समुदाय चिंतित है। उनका कहना है कि अगर जंगल खत्म हो गए, तो उनका जीवन भी पहले जैसा नहीं रहेगा। उन्हें डर है कि उनकी संस्कृति, उनकी पहचान और उनका पारंपरिक जीवन धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा।
इसी चिंता को लेकर कई आदिवासी लोग शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रहे हैं। कई लोग धरने पर बैठे हैं। कुछ लोग पानी में खड़े होकर प्रदर्शन कर रहे हैं, तो कुछ जमीन पर लेटकर अपनी बात सरकार और समाज तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका संदेश साफ है। वे सिर्फ विरोध नहीं कर रहे, बल्कि अपने जंगल, अपनी जमीन और अपनी संस्कृति को बचाने की मांग कर रहे हैं।

आदिवासी समुदाय का कहना है कि विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास होना चाहिए जिससे प्रकृति और वहां रहने वाले लोगों का जीवन प्रभावित न हो। वे चाहते हैं कि किसी भी बड़े फैसले से पहले उनकी बात सुनी जाए और उनकी सहमति ली जाए। उनका मानना है कि जंगलों की सबसे अच्छी सुरक्षा वही लोग कर सकते हैं, जो पीढ़ियों से वहां रह रहे हैं और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीते आए हैं।
ये तो सब जानते हैं कि आदिवासी समुदाय का प्रकृति से रिश्ता बहुत गहरा होता है। वे जंगल से उतना ही लेते हैं, जितनी जरूरत होती है। यही वजह है कि कई जगहों पर आदिवासी इलाकों में आज भी जैव विविधता और प्राकृतिक संतुलन बेहतर देखने को मिलता है।

आज पूरी दुनिया पर्यावरण संरक्षण की बात कर रही है। पेड़ लगाने, पानी बचाने और जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए कई अभियान चलाए जा रहे हैं। ऐसे समय में आदिवासी समुदाय का जीवन और उनकी सोच हमें बहुत कुछ सिखा सकती है। यह मामला सिर्फ एक इलाके का नहीं है। यह सवाल इस बात का भी है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। कैसे लोगों की जरूरतें भी पूरी हों और प्रकृति भी सुरक्षित रहे। आखिरकार, अगर जंगल बचेंगे, तभी नदियां बचेंगी, जानवर बचेंगे और हमारा भविष्य भी सुरक्षित रहेगा। बाकी इस चिता आंदोलन को स्थानीय पुलिस ने खत्म कराने की कोशिश की है,कई लोगों को अस्पताल में तबियत खराब होने की वजह से भर्ती भी कराया गया है।





