देशभर के लाखों फ्लैट खरीदारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और राहत भरा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि बिल्डर तय समय पर फ्लैट का कब्जा नहीं देता है, तो खरीदार को बाद में भी मुआवजा पाने का पूरा अधिकार रहेगा।
यह अहम फैसला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस पी.बी. वराले की पीठ द्वारा सुनाया गया है। इस निर्णय के तहत सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन यानी NCDRC के उस पुराने फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें यह कहा गया था कि यदि खरीदार को फ्लैट का कब्जा मिल चुका है, तो वह अब उपभोक्ता नहीं माना जाएगा और देरी के लिए मुआवजा नहीं मांग सकता।

द्वारका हाउसिंग प्रोजेक्ट से जुड़ा है मामला
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने खारिज किया पुराना तर्क

यह पूरा कानूनी विवाद दिल्ली-एनसीआर के द्वारका क्षेत्र में स्थित एक हाउसिंग प्रोजेक्ट से जुड़ा हुआ है। साल 2005 में एक फ्लैट खरीदार ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उसे बिल्डर द्वारा तय समय सीमा के भीतर फ्लैट का कब्जा नहीं दिया गया। कई वर्षों की देरी के बाद आखिरकार उसे फ्लैट तो मिल गया, लेकिन इस अवधि के दौरान उसे मानसिक तनाव, आर्थिक नुकसान और विभिन्न प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ा।
नीचे की उपभोक्ता अदालतों ने उसकी शिकायत यह कहकर खारिज कर दी थी कि अब फ्लैट प्राप्त हो जाने के बाद वह उपभोक्ता नहीं रहा और मुआवजे का दावा नहीं कर सकता। इस तर्क को गलत ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी खरीदार को समय पर सेवा नहीं मिली, तो उसका अधिकार केवल इसलिए समाप्त नहीं हो सकता क्योंकि बाद में सेवा प्रदान कर दी गई। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि फ्लैट का कब्जा मिलना और देरी के कारण मुआवजा पाना दो पूरी तरह से अलग-अलग मुद्दे हैं, जिन्हें एक साथ जोड़ा नहीं जाना चाहिए।

आर्बिट्रेशन क्लॉज और उपभोक्ता आयोग के अधिकार
जिला उपभोक्ता आयोग को एक साल में निपटारे का निर्देश

इस मामले की सुनवाई के दौरान एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु पर भी प्रकाश डाला गया। बिल्डर और खरीदार के बीच हुए समझौतों में अक्सर आर्बिट्रेशन यानी मध्यस्थता का क्लॉज होता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केवल आर्बिट्रेशन क्लॉज के मौजूद होने से उपभोक्ता अदालत का अधिकार क्षेत्र समाप्त नहीं हो जाता।
इस कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए सर्वोच्च अदालत ने इस मामले को वापस जिला उपभोक्ता आयोग के पास भेज दिया है। आयोग को निर्देश दिया गया है कि वह आगामी एक वर्ष के भीतर इस मामले का निपटारा करे। जिला उपभोक्ता आयोग अब यह जांच करेगा कि क्या फ्लैट देने में वास्तव में देरी हुई थी, देरी के लिए बिल्डर जिम्मेदार था या कोई अन्य कारण था, क्या खरीदार ने बिना शर्त कब्जा स्वीकार किया था और क्या उसे मुआवजा मिलना चाहिए या नहीं।

इन सभी बिंदुओं की गहन जांच के बाद ही इस मामले में अंतिम आदेश पारित किया जाएगा। इस ऐतिहासिक फैसले से देश के उन तमाम फ्लैट खरीदारों को बड़ी मजबूती मिली है जो प्रोजेक्ट्स में हुई देरी के कारण परेशान रहे हैं और कब्जा मिलने के बाद मुआवजे की उम्मीद छोड़ चुके थे।





