पटना (खबर डोज़ ब्यूरो)। बिहार में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR के मुद्दे को लेकर राजनीतिक बयानबाजी लगातार तेज होती जा रही है। इसी कड़ी में अब CPI(ML) ने सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ अपनी आवाज को और मुखर करने का ऐलान कर दिया है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने घोषणा की है कि आगामी 1 अक्टूबर को पटना में एक बड़ी जनसुनवाई आयोजित की जाएगी। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य SIR से जुड़े विभिन्न पहलुओं और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर जनता के बीच अपनी बात रखना और लोगों की शिकायतें सुनना है।
राजधानी पटना में आयोजित होने वाली इस जनसुनवाई को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। पार्टी का कहना है कि SIR की पूरी प्रक्रिया के दौरान कई गंभीर सवाल उठे हैं, जिनका संतोषजनक जवाब अब तक सामने नहीं आया है। इन्हीं तमाम सवालों और तर्कों को जनता के सामने लाने के लिए इस विशेष जनसुनवाई का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें विभिन्न पक्षों की दलीलें सुनी जाएंगी।
दीपांकर भट्टाचार्य की खुली बहस की चुनौती
पार्टी महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने हाल ही में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की ओर से की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस का जिक्र करते हुए उन्हें सीधे तौर पर बहस की चुनौती दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर सरकार या सत्तारूढ़ दल के नेता SIR और चुनाव आयोग की कार्रवाई को लेकर अपना पक्ष रख रहे हैं, तो CPI(ML) भी अपने सवाल और सबूतों के साथ आमने-सामने की चर्चा के लिए पूरी तरह तैयार है।
उन्होंने कहा कि 1 अक्टूबर को होने वाली जनसुनवाई के मंच पर वे मुख्यमंत्री के सामने अपने तर्कों को रखने से पीछे नहीं हटेंगे। इस पहल के जरिए पार्टी यह साबित करने की कोशिश करेगी कि SIR की प्रक्रिया में कथित तौर पर किन बिंदुओं पर खामियां हैं और विपक्षी दलों की आपत्तियां किस आधार पर टिकी हुई हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग
इस पूरे घटनाक्रम के बीच दीपांकर भट्टाचार्य ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को एक बार फिर जोर-शोर से उठाया है। उनका तर्क है कि आगामी चुनावों से पहले मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हट जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की तरफ से कुछ मामलों में जिस तरह की बातें स्वीकार की गई हैं, उसके बाद पद पर बने रहने का कोई नैतिक औचित्य नहीं बचता है।
पार्टी का मानना है कि संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यह कदम जरूरी है। यदि इस पर तुरंत संज्ञान नहीं लिया गया, तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था और स्वतंत्र संस्थाओं के प्रति आम जनता के भरोसे को ठेس पहुंच सकती है। अब सबकी निगाहें 1 अक्टूबर को होने वाली इस जनसुनवाई पर टिकी हैं कि पार्टी इसमें क्या नए तथ्य रखती है और इस राजनीतिक चुनौती पर सरकार या आयोग की क्या प्रतिक्रिया सामने आती है।





