प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' के 135वें एपिसोड में बिहार के ऐतिहासिक नालंदा विश्वविद्यालय की जमकर तारीफ की है। पीएम मोदी ने बताया कि कैसे यह विश्वविद्यालय भारत की सदियों पुरानी सभ्यता और धरोहर को आधुनिक शिक्षा व तकनीक के साथ बेहतरीन ढंग से जोड़ रहा है।

लगभग दो साल पहले जून 2024 में नालंदा यूनिवर्सिटी के नए कैंपस के उद्घाटन के ऐतिहासिक पलों को याद करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें यह देखकर बेहद खुशी हो रही है कि नालंदा ने हमारी प्राचीन 'शास्त्रार्थ' परंपरा को फिर से जीवंत कर दिया है।

नालंदा विश्वविद्यालय और 'शास्त्रार्थ' परंपरा का महत्व
प्रधानमंत्री ने 'शास्त्रार्थ' के महत्व पर रोशनी डालते हुए स्पष्ट किया कि यह केवल अपनी बात रखने या बहस करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह संवाद, चिंतन और विचार-मंथन की एक बेहद अनुशासित प्राचीन प्रक्रिया है।

शास्त्रार्थ के प्रमुख पहलू
- यह परंपरा प्रतिभागियों को तर्क और तथ्यात्मक ढंग से अपनी बात रखना सिखाती है।
- इसका सबसे बड़ा पहलू यह है कि यह हमें अपने विरोधी के विचारों को भी धैर्य के साथ सुनने और उन्हें समझने की सीख देती है।
- नालंदा विश्वविद्यालय ने इस प्राचीन परंपरा को अपने दीक्षांत समारोह का हिस्सा बनाया है, जिसमें लगभग आधे छात्र विदेशों से थे।
प्रधानमंत्री ने देश के अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों से भी इस बेहतरीन पहल को अपनाने की अपील की है। आज के तकनीकी दौर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि एआई इनोवेशन के दौर में अपनी रचनात्मकता को बचाते हुए अपनी जड़ों से जुड़े रहना जरूरी है और नालंदा ने इसका सटीक जवाब दिया है।

सेंट्रल संस्कृत यूनिवर्सिटी की नई पहल
नालंदा के साथ-साथ पीएम मोदी ने दिल्ली की सेंट्रल संस्कृत यूनिवर्सिटी के एक कदम की भी तारीफ की है। यह विश्वविद्यालय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा साइंस में बी.टेक प्रोग्राम शुरू करने जा रहा है। इस आधुनिक तकनीक की मदद से हजारों साल पुराने प्राचीन ग्रंथों, वेदों और दुर्लभ पांडुलिपियों को डिजिटल रूप में हमेशा के लिए सुरक्षित किया जा सकेगा। हजारों साल पुरानी नालंदा यूनिवर्सिटी अब एक नए अवतार में भारत का भाग्य संवार रही है।






