बिहार की राजनीति से एक अहम खबर सामने आ रही है जहां पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव राजनीतिक प्रतिष्ठा की बड़ी लड़ाई बनता जा रहा है। इस सीट पर जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर के चुनाव लड़ने की चर्चा के बीच कांग्रेस पार्टी ने उन्हें खुला समर्थन देने का ऐलान किया है, जिससे बीजेपी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
जन सुराज पार्टी पिछले कई हफ्तों से बांकीपुर क्षेत्र में लगातार जनसंपर्क अभियान चला रही है और पार्टी के कार्यकर्ता बूथ स्तर तक की तैयारियों में जुटे हुए हैं। बांकीपुर विधानसभा सीट लंबे समय से बीजेपी का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है जहां से बीजेपी के नेता नितिन नवीन लगातार कई बार विधायक चुने गए थे। उनके राज्यसभा सदस्य बनने और विधायक पद से इस्तीफा देने के कारण ही इस सीट पर उपचुनाव कराया जा रहा है, जो बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है।

बांकीपुर उपचुनाव में विपक्षी एकजुटता के संकेत
कांग्रेस और राजद की प्रतिक्रिया से बदले राजनीतिक समीकरण
विपक्ष इस चुनाव को पूरी गंभीरता से ले रहा है और कांग्रेस ने खुलकर सुझाव दिया है कि यदि प्रशांत किशोर बांकीपुर से चुनाव लड़ते हैं, तो महागठबंधन को अपना अलग उम्मीदवार नहीं उतारना चाहिए। कांग्रेस का मानना है कि सभी विपक्षी दलों को एकजुट होकर एक साझा उम्मीदवार का समर्थन करना चाहिए ताकि बीजेपी को उसके सबसे मजबूत गढ़ में कड़ी टक्कर दी जा सके। कांग्रेस नेता ऋषि मिश्रा के अनुसार बांकीपुर पिछले करीब 30 साल से बीजेपी का मजबूत क्षेत्र रहा है और विपक्ष का मुख्य उद्देश्य बीजेपी को हराना होना चाहिए।

कांग्रेस के इस सुझाव पर राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद ने भी अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया दर्ज कराई है। राजद प्रवक्ता एजाज अहमद ने स्पष्ट किया है कि पार्टी का मुख्य लक्ष्य बीजेपी को हराना है और अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व द्वारा लिया जाएगा, लेकिन विपक्षी एकता हमेशा उनकी प्राथमिकता रही है। पिछली बार रेखा गुप्ता महागठबंधन की बांकीपुर उम्मीदवार थीं जिन्हें लगभग 60,000 वोट मिले थे, ऐसे में यदि महागठबंधन का पूरा समर्थन प्रशांत किशोर को मिलता है तो चुनाव के समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।

सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह पहली विधानसभा सीट होगी जहां उपचुनाव होने जा रहा है, जिस कारण कई राजनीतिक विशेषज्ञ इसे उनकी पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा भी मान रहे हैं। अगर बीजेपी इस सीट को आसानी से जीतती है तो उसे एक बड़ा राजनीतिक संदेश मिलेगा, लेकिन यदि विपक्ष एकजुट होकर कड़ी चुनौती पेश करता है तो इसका असर राज्य के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है।





