Politics: यूरोप में बैठे तेजस्वी अपने बांकीपुर उम्मीदवार रेखा गुप्ता को जिताएंगे? क्या ऐसे चलेगी राजनीति? क्या ऐसे विपक्ष की भूमिका निभाएंगे तेजस्वी? बहुत सारे उठने लगे हैं सवाल और सवाल उठना लाजिमी भी है.. क्योंकि उनके कार्यकर्ता की तरह बिहार की जनता बेवकूफ नहीं है..जिस तरीके से अपने कार्यकर्ताओं को बेवकूफ बनाकर पांच जुलाई को स्थापना दिवस नहीं एक ही को स्थापना दिवस मना कर राजद ने अपने कार्यकर्ताओं को ठगा और यूरोप ट्रिप पर तेजस्वी निकल गए । इसी बीच बांकीपुर चुनाव की घोषणा होती है ...रेखा गुप्ता नामांकन करती हैं और मंच पर एक भी वरिष्ठ नेता नजर नहीं आता। तेजस्वी भी नदारत महागठबंधन के बड़े बड़े नेता भी गायब और वहीं दूसरी तरफ बीजेपी के उम्मीदवार अभिषेक बंटी ने जब नामांकन किया तो एनडीए ने पूरी ताकत झोंक दी और अब जब परिणाम अगर बीजेपी के पक्ष में आता है तो यूरोप से घूम फिर कर आएंगे तेजस्वी और कह देंगे कि वोट चोरी हो गई । अब लगता है तेजस्वी एकदम निश्चिंत है की वोट तो चोरी हो ही जाना है ,EVM हैक करने का आरोप हम लगा ही देंगे और जनता का पता नहीं लेकिन हमारे बेवकूफ कार्यकर्ता तो हम ही पर विश्वास कर ही लेंगे । और यही कारण है कि अब सत्ता में आना तो छोड़िए विपक्ष की भूमिका में भी तेजस्वी यादव फेल हो गए हैं।

पटना की हॉट सीट बांकीपुर में उपचुनाव है। 30 को वोटिंग है और लालू के दुलरवा गायब है। जिस पर लालू यादव ने पार्टी की जिम्मेदारी सौंप वहीं विदेश में मौज मस्ती कर रहा है और दूसरी तरफ देखिए बीजेपी ने अपने गढ़ में भी जान लगा दी है। प्रशांत किशोर अलग चुनावी मैदान में एक्टिव है लेकिन हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में नंबर दो पर रहने वाली रेखा गुप्ता को उनकी पार्टी से ही समर्थन नहीं मिल पा रहा। बिहार कांग्रेस अलग नाराज है.. महागठबंधन में अलग उथल-पुथल है। बेचारी रेखा गुप्ता की नैया लगता है इस बार डूबने वाली है क्योंकि उनके लाठ साहब को विदेश में छुट्टियां मनाने से ही फुर्सत नहीं है। उन्हें एक सीट से कोई फर्क ही नहीं पड़ता या फिर शायद तेजस्वी को यह लगता है कि अगर रेखा गुप्ता जीत भी गई तो क्या पता बाद में किसी दूसरी पार्टी में दल बदल ना ले।

बिहार की राजनीति में इस समय सबसे ज्यादा चर्चा अगर किसी बात की हो रही है, तो वह है बांकीपुर उपचुनाव और तेजस्वी यादव का यूरोप दौरा।
राजनीति में एक बात हमेशा कही जाती है कि चुनाव सिर्फ उम्मीदवार नहीं लड़ता, पूरी पार्टी लड़ती है। लेकिन बांकीपुर की तस्वीर कुछ अलग ही नजर आ रही है। राजद ने रेखा गुप्ता को मैदान में उतारा। नामांकन का दिन आया। उम्मीद थी कि पार्टी के बड़े चेहरे दिखाई देंगे, कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ेगा, माहौल बनेगा। लेकिन मंच पर न बड़े नेता दिखे और न ही पार्टी का वह जोश, जिसकी चर्चा चुनाव के समय होती है।

सबसे बड़ा सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि पार्टी की कमान संभाल रहे तेजस्वी यादव उसी समय यूरोप में हैं। अब सवाल यह नहीं है कि कोई नेता विदेश क्यों गया। हर व्यक्ति को निजी जीवन जीने का अधिकार है। लेकिन जब चुनाव सिर पर हो, उम्मीदवार मैदान में हो और पार्टी आपसे नेतृत्व की उम्मीद कर रही हो, तब आपकी मौजूदगी भी राजनीति का हिस्सा बन जाती है।
दूसरी तरफ बीजेपी के उम्मीदवार अभिषेक बंटी के नामांकन में एनडीए ने पूरी ताकत लगा दी। बड़े नेता पहुंचे, कार्यकर्ता पहुंचे, शक्ति प्रदर्शन हुआ और यह संदेश देने की कोशिश हुई कि पार्टी इस चुनाव को गंभीरता से ले रही है।

यहीं से तुलना शुरू हो जाती है। एक तरफ पूरी टीम मैदान में दिखाई दे रही है, दूसरी तरफ विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा विदेश में नजर आ रहा है। अब विपक्ष के समर्थक कह सकते हैं कि चुनाव सिर्फ एक नेता से नहीं जीते जाते। यह बात सही भी है। लेकिन राजनीति में नेतृत्व की मौजूदगी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाती है। यही वजह है कि लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर बांकीपुर जैसा महत्वपूर्ण चुनाव क्या इतना छोटा था कि उस पर ध्यान देने की जरूरत ही नहीं समझी गई?
या कहीं ऐसा तो नहीं तेजस्वी यादव पहले से ही नतीजा मानकर तो नहीं चल रहे? क्योंकि अगर हार हुई तो फिर वही पुराना बयान तैयार रहेगा...ईवीएम पर सवाल, वोट चोरी का आरोप और चुनाव प्रक्रिया पर निशाना।

लेकिन जनता अब हर चुनाव में एक ही कहानी सुनना नहीं चाहती। जनता यह भी देखती है कि चुनाव के दौरान नेता कितना समय मैदान में रहा और कितना समय जनता के बीच बिताया। इधर एक और चर्चा महागठबंधन के अंदर भी चल रही है। कांग्रेस की नाराजगी की खबरें आती रहती हैं। सहयोगी दलों के बीच तालमेल पर भी सवाल उठते रहते हैं। ऐसे समय में विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा अगर बिहार से बाहर हो, तो राजनीतिक चर्चा होना स्वाभाविक है।

प्रशांत किशोर भी लगातार मैदान में सक्रिय हैं। एनडीए अपने उम्मीदवार के लिए पूरी ताकत लगा रहा है। ऐसे में राजद की उम्मीदवार रेखा गुप्ता कहीं अकेली पड़ती हुई दिखाई दे रही हैं। राजनीति में उम्मीदवार को सिर्फ चुनाव चिन्ह नहीं, संगठन का साथ भी चाहिए होता है।

बाकी अब देखते हैं की क्या यूरोप से बैठकर बिहार की राजनीति चल सकती है? क्या विपक्ष की जिम्मेदारी सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित रहनी चाहिए? या फिर जनता अब मैदान में दिखने वाले नेताओं को ज्यादा महत्व देगी? इन सवालों का जवाब फिलहाल जनता के पास है, और अंतिम फैसला भी वही करेगी। जब चुनावी परिणाम आयेंगे





