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अलनीनो के साये में रबी सीजन, गेहूं और सरसों की खेती पर मंडराया संकट

| Published: | Updated:
अलनीनो के साये में रबी सीजन, गेहूं और सरसों की खेती पर मंडराया संकट
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मुख्य बातें

  • देश में अक्टूबर से शुरू होने वाले आगामी रबी सीजन की तैयारियों के बीच अलनीनो के प्रभाव ने किसानों और कृषि मंत्रालय की चिंता बढ़ा दी है।
  • कृषि सचिव अतिश चंद्र के मुताबिक, जिन इलाकों में खेती पूरी तरह से बारिश पर निर्भर है, वहां मौसम का मिजाज फसलों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
  • यदि बारिश का संतुलन बिगड़ा तो गेहूं, सरसों, दाल और तिलहन जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार सीधे तौर पर प्रभावित होगी, जिसका असर अंततः बाजार में खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
  • रबी फसलों की सफलता के लिए शुरुआती दौर में खेत में पर्याप्त नमी का होना बेहद जरूरी माना जाता है।

अक्टूबर से शुरू होने वाली रबी बुवाई पर मौसम की टेढ़ी नजर

खबर डोज़ ब्यूरो। देश में अक्टूबर से शुरू होने वाले आगामी रबी सीजन की तैयारियों के बीच अलनीनो के प्रभाव ने किसानों और कृषि मंत्रालय की चिंता बढ़ा दी है। कृषि सचिव अतिश चंद्र के मुताबिक, जिन इलाकों में खेती पूरी तरह से बारिश पर निर्भर है, वहां मौसम का मिजाज फसलों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। यदि बारिश का संतुलन बिगड़ा तो गेहूं, सरसों, दाल और तिलहन जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार सीधे तौर पर प्रभावित होगी, जिसका असर अंततः बाजार में खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।

अलनीनो के साये में रबी सीजन, गेहूं और सरसों की खेती पर मंडराया संकट

रबी फसलों की सफलता के लिए शुरुआती दौर में खेत में पर्याप्त नमी का होना बेहद जरूरी माना जाता है। हालांकि इस बार मौसम की अनिश्चितता के चलते किसानों के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। कृषि सचिव ने स्पष्ट किया है कि कुछ क्षेत्रों में मिट्टी के भीतर अत्यधिक नमी की समस्या देखने को मिल सकती है, जबकि कई सूखे और कम बारिश वाले इलाकों में फसलें लंबे समय तक पानी की कमी से जूझ सकती हैं। ऐसे में किसानों को पारंपरिक तरीकों के बजाय स्थानीय स्तर पर मौसम की स्थिति को परखकर ही खेती के कदम उठाने होंगे।

विशाल रकबे पर होती है रबी की खेती, उत्पादन घटने से बाजार पर आ सकता है दबाव

भारत में हर साल लगभग 638 लाख हेक्टेयर भूभाग पर रबी की विभिन्न फसलों की बुवाई की जाती है। इसमें अकेले गेहूं का रकबा 300 लाख हेक्टेयर से अधिक का है, जबकि करीब 140 लाख हेक्टेयर में दालें, 87 लाख हेक्टेयर में तिलहन और 55 लाख हेक्टेयर जमीन पर मोटे अनाजों की खेती की जाती है। इस बड़े दायरे को देखते हुए मौसम में किसी भी तरह का असंतुलन देश की खाद्य सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर सकता है।

  • गेहूं की बुवाई 300 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में की जाती है।
  • दालों की खेती का रकबा करीब 140 लाख हेक्टेयर है।
  • तिलहन की फसलें लगभग 87 लाख हेक्टेयर में बोई जाती हैं।
  • मोटे अनाज की खेती का दायरा करीब 55 लाख हेक्टेयर है।
  • अलनीनो के साये में रबी सीजन, गेहूं और सरसों की खेती पर मंडराया संकट

खरीफ सीजन के दौरान भी देश के कई राज्यों में किसानों को बुवाई से लेकर फसल कटाई तक मौसम की मार का सामना करना पड़ा था। अब रबी सीजन के लिए भी कृषि मंत्रालय ने जलवायु परिवर्तन के खतरों को रेखांकित किया है। सरकार का जोर अब फसल विविधीकरण और टिकाऊ खेती की ओर बढ़ने पर है, ताकि किसान केवल एक या दो फसलों पर निर्भर न रहें और बदलते मौसम के अनुकूल पैदावार सुनिश्चित कर सकें।

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