मॉनसून सत्र 2026 के दौरान केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर देश का राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ है। राहुल गांधी, कांग्रेस और CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) के विरोध प्रदर्शन के बीच यह सवाल लगातार पूछा जा रहा है कि केंद्र की मोदी सरकार इस मामले में बैकफुट पर आने को तैयार क्यों नहीं है। विपक्ष और आंदोलनकारियों के सामने सरकार का यह रुख सिर्फ एक मंत्री को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह फैसला सरकार की पूरी राजनीतिक रणनीति, संस्थागत सुधारों की साख और प्रशासनिक अधिकार को बचाए रखने के इर्द-गिर्द घूमता है।
CJP का जंतर-मंतर प्रदर्शन और सरकार की बातचीत की कोशिश
दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे CJP आंदोलन और संसद मार्च को देखते हुए सरकार ने भी संवाद के रास्ते तलाशने शुरू किए हैं। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने स्पष्ट किया है कि सरकार और CJP के बीच गतिरोध खत्म करने के लिए कल से अब तक चार बार बातचीत की कोशिशें की जा चुकी हैं। केंद्र सरकार ने यह संदेश दिया है कि वह बातचीत के लिए तैयार है और मंत्री स्तर पर जंतर-मंतर जाकर प्रदर्शनकारियों से चर्चा करने पर भी सहमति जताई गई है।

पेपर लीक विवाद और विपक्षी नेताओं के तीखे सवाल
पेपर लीक और प्रदर्शनकारियों पर हुए लाठीचार्ज को लेकर विपक्षी खेमा लगातार हमलावर है:
- प्रियंका गांधी: उन्होंने सीधे तौर पर शिक्षा मंत्री और गृह मंत्री से सवाल पूछा कि देश में पेपर लीक क्यों हुआ और छात्रों पर लाठी क्यों चलाई गई?
- इकरा हसन: सरकार द्वारा छात्रों से बातचीत की पेशकश पर प्रतिक्रिया देते हुए सांसद इकरा हसन ने सरकार की नीयत पर सवाल खड़े किए।
- अन्ना हजारे: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखी चिट्ठी के संदर्भ में अन्ना हजारे ने कहा कि केवल इस्तीफा लेने से सरकार नहीं गिरती।
पीएम मोदी का बड़ा ऐलान और नेताओं की प्रतिक्रियाएं
विवाद के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि पेपर लीक के दोषियों को कड़ी सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएंगे। पीएम मोदी के इस बयान पर CJP ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। वहीं, आंदोलन के दौरान अभिजीत दीपके ने प्रदर्शनकारियों से अपनी बात रखी, जबकि पहलवान बजरंग पूनिया और बीजेपी नेता बबीता फोगाट ने भी जंतर-मंतर और सरकारी कदमों को लेकर अपनी प्रतिक्रियाएं दर्ज कराई हैं।

मोदी सरकार के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
सोनम वांगचुक और विभिन्न राजनीतिक धड़ों की मौजूदगी के बीच मोदी सरकार के लिए धर्मेंद्र प्रधान का पद पर बने रहना प्रशासनिक साख का विषय बन गया है। सरकार का मानना है कि यदि किसी आंदोलन के दबाव में आकर इस्तीफा लिया जाता है, तो इससे प्रशासनिक संस्थाओं के फैसलों पर लगातार सवाल उठेंगे और नीतिगत सुधारों की गति प्रभावित होगी। यही कारण है कि सरकार जंतर-मंतर पर बातचीत का प्रस्ताव रखकर हल निकालने की कोशिश तो कर रही है, लेकिन प्रशासनिक और राजनीतिक रणनीति के तहत किसी भी तरह के समझौते से बच रही है।





