Education: बिहार के सरकारी स्कूलों में 885 करोड़ रुपये की खरीद योजना अब बड़े विवाद में घिर गई है। हैरानी की बात यह है कि सिर्फ खरीद में गड़बड़ी के आरोप ही नहीं लगे हैं, बल्कि उस गड़बड़ी की जांच भी अब सवालों के घेरे में है। आरोप है कि पहली जांच रिपोर्ट में जिन स्कूलों में गड़बड़ी मिली थीं, बाद में आई दूसरी रिपोर्ट में उनमें से ज्यादातर मामलों को हटा दिया गया। मतलब साफ़ है की शिक्षा विभाग में 885 करोड़ के घोटाले की जांच में भी बड़ा घोटाला किया गया है।
सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए बेंच-डेस्क, स्कूल बैग, थाली और बोरिंग जैसी जरूरी चीजों की खरीद पर सरकार ने करीब 885 करोड़ रुपये खर्च किए। लेकिन जब शिकायतें सामने आईं तो जांच शुरू हुई। शुरुआती जांच में कई जगह गंभीर गड़बड़ियां सामने आईं। मामला आगे बढ़ा तो पूरा बिहार चौंक गया। मामला विधानसभा तक पहुंचा, शिकायतें हुईं और कई जगह एफआईआर भी दर्ज की गई। लेकिन कुछ ही महीनों बाद आई दूसरी रिपोर्ट में ज्यादातर गड़बड़ियां गायब हो गईं। अब सवाल उठ रहा है कि आखिर जांच रिपोर्ट में इतना बड़ा बदलाव कैसे हो गया?

बक्सर जिले को पूरे मामले में नमूना जिला बनाया गया। यहां 851 स्कूलों में बेंच-डेस्क की आपूर्ति हुई थी। जांच के लिए 705 स्कूल तय किए गए, लेकिन रिपोर्ट में सिर्फ 697 स्कूलों का ही जिक्र मिला। इतना ही नहीं, खरीद से जुड़े रिकॉर्ड भी अधूरे पाए गए। कई जगह सप्लायर का नाम ही दिया गया। कहीं एजेंसी की जगह किसी व्यक्ति का नाम लिखा था, तो कहीं किराना दुकान को सप्लायर बताया गया। यानी खरीद, आपूर्ति और जांच,तीनों के आंकड़े एक-दूसरे से मैच नहीं कर पा रहे थे।

शिकायतकर्ता शिवप्रकाश राय का कहना है कि यह सिर्फ बक्सर का ही मामला नहीं, बल्कि पूरे बिहार के 38 जिलों से जुड़ा बड़ा घोटाला है। उनका कहना है कि सरकार ने पहले बक्सर को नमूना जिला बनाकर जांच कराने की बात कही थी और उसके बाद बाकी 37 जिलों की भी जांच होनी थी।दिलचस्प बात यह है कि खगड़िया, किशनगंज और नालंदा के जिला शिक्षा अधिकारियों पर कार्रवाई भी हो चुकी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि बाकी जिलों की जांच अब तक पूरी क्यों नहीं हुई?

ग्राउंड रिपोर्ट में भी कई गंभीर कमियां सामने आईं। कई स्कूलों में बेंच-डेस्क कुछ ही समय में टूट गए। कहीं बोरिंग लगी लेकिन मोटर नहीं थी। कहीं मोटर लगी तो पाइप टूटे मिले। और जहां दोनों मौजूद थे, वहां पानी ही नहीं आ रहा था। कुछ शिक्षकों ने रिकॉर्ड पर यह भी स्वीकार किया कि कई जिला कार्यक्रम पदाधिकारी अपने रिश्तेदारों की एजेंसियों से सामान की सप्लाई करवा रहे थे। साथ ही यह भी आरोप है कि स्कूलों में पहुंचाई गई सामग्री तय नियमों के अनुसार नहीं थी। इटाढ़ी के प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी सुनील कुमार का कहना है कि उन्होंने जिला स्तर के अधिकारियों के भारी दबाव में एफआईआर दर्ज की थी। उनके मुताबिक खरीद, सप्लायर का चयन और सामान की आपूर्ति में ब्लॉक स्तर की कोई भूमिका नहीं थी। पूरा काम जिला स्तर से संचालित किया जा रहा था।

इस पूरे मामले पर अब बिहार सरकार भी सख्त नजर आ रही है। शिक्षा मंत्री मिथलेश तिवारी क कहना है की सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम करती है। अगर जांच में किसी भी स्तर पर लीपापोती या गड़बड़ी पाई गई तो किसी को बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने खुद पूरे मामले की समीक्षा करने की बात कही है।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर पहली जांच रिपोर्ट में जिन 340 स्कूलों में गड़बड़ी बताई गई थी, वे दूसरी रिपोर्ट में घटकर सिर्फ 35 कैसे रह गए? क्या जांच के दौरान सच बदल गया या फिर किसी ने सच को बदलने की कोशिश की? इन सवालों के जवाब अब सरकार की अगली कार्रवाई और निष्पक्ष जांच से ही मिल पाएंगे। तब तक पुरे बिहार में हडकंप की स्थिति है,जल्द ही इस मामले में कई बड़े बड़े अधिकारी और स्कूलों के प्रिंसिपल पर कार्यवाई होगी। नौकरी भी खतरे में है,जिससे विभाग के साथ स्कूल प्रसाशन में भी हड़कंप की स्थिति है।





