बांकीपुर उपचुनाव में लगे झटके के बाद अब RJD के अंदर बड़ा बदलाव होने की आहट सुनाई दे रही है। पार्टी के भीतर असंतोष की आवाजें, नेताओं के बयान और संगठन की कमजोर होती पकड़ ने तेजस्वी यादव की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है की क्या RJD में बड़े स्तर पर संगठनात्मक सर्जरी होने जा रही है? चर्चा तेज है कि पार्टी प्रदेश कमेटी से लेकर जिलों, प्रखंडों, पंचायतों और अलग-अलग संगठनों तक में बड़े फेरबदल की तैयारी कर रही है। माना जा रहा है कि नेतृत्व अब सिर्फ चेहरे बदलने के बजाय संगठन को बूथ स्तर तक नए सिरे से खड़ा करना चाहता है। सबसे ज्यादा चर्चा प्रदेश अध्यक्ष मंगनी लाल मंडल को लेकर है। अटकलें हैं कि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी से हटाकर पार्टी किसी नए चेहरे को आगे ला सकती है। हालांकि, अभी तक RJD की ओर से इसको लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

तो आखिर प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर किसकी नजर है? पार्टी के अंदर जिन नामों की चर्चा चल रही है, उनमें कुमार सर्वजीत, आलोक मेहता, शिवचंद्र राम और रणविजय साहू के नाम प्रमुख बताए जा रहे हैं। कुमार सर्वजीत को तेजस्वी यादव के भरोसेमंद और अनुशासित नेताओं में गिना जाता है। वहीं आलोक मेहता पार्टी के पुराने और अनुभवी चेहरों में हैं और ओबीसी प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी उनका नाम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शिवचंद्र राम की संगठन में अच्छी पकड़ बताई जाती है, जबकि रणविजय साहू को भी सांगठनिक क्षमता रखने वाला नेता माना जाता है।
लेकिन मामला सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष बदलने का नहीं है। असली चुनौती तो पूरी संगठनात्मक मशीनरी को दोबारा खड़ा करने की है। सूत्रों के मुताबिक, जिन जिलों और प्रखंडों में बूथ और पंचायत स्तर तक मजबूत कमेटियां नहीं बन सकीं, वहां नेतृत्व नए चेहरों को मौका दे सकता है। यानी आने वाले दिनों में कई पुराने पदाधिकारियों की कुर्सी जा सकती है और जमीन पर सक्रिय नेताओं को संगठन में जगह मिल सकती है। तेजस्वी यादव के सामने इस पूरी कवायद में कई मोर्चे हैं। एक तरफ उन्हें पार्टी के पुराने नेताओं को साथ लेकर चलना है, तो दूसरी तरफ युवा नेतृत्व को मजबूत करना है। इसके साथ ही संगठन में वफादारी, सक्रियता और जमीनी पकड़ के बीच संतुलन बनाना भी बड़ी चुनौती होगी।

नई टीम तैयार करने में तेजस्वी के भरोसेमंद नेताओं की भूमिका भी अहम मानी जा रही है। भोला यादव, अब्दुल बारी सिद्दीकी और सुनील कुमार सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं के नाम इस रणनीति में सामने आ रहे हैं। माना जा रहा है कि जिलों से मिलने वाले फीडबैक और संगठनात्मक अनुभव के आधार पर नई टीम का खाका तैयार किया जा सकता है।
इधर, पार्टी के भीतर असंतोष का एक और मोर्चा परिवार से जुड़ा हुआ है। सारण के पार्टी प्रवक्ता हरेलाल यादव को छह वर्षों के लिए निष्कासित किए जाने के बाद रोहिणी आचार्य की नाराजगी सार्वजनिक हुई थी। उन्होंने कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए पार्टी में पुराने ‘लालूवादियों’ को तरजीह देने की बात कही थी।तेजप्रताप यादव की ओर से भी परिवार और पार्टी के मुद्दों को लेकर समय-समय पर खुलकर अपनी भावनाएं सामने रखी गई हैं। ऐसे में संगठन में बदलाव करते समय तेजस्वी यादव के सामने सिर्फ राजनीतिक समीकरण नहीं, बल्कि पारिवारिक और पुराने संगठनात्मक समीकरणों को साधने की चुनौती भी होगी।
इसके अलावा मुस्लिम वोट बैंक को लेकर भी RJD की चिंता बढ़ी हुई बताई जा रही है। जन सुराज की बढ़ती सक्रियता और पार्टी कार्यकर्ताओं से जुड़े डेटा के कथित लीक की खबरों ने नेतृत्व को और सतर्क कर दिया है। यानी साफ है की RJD के लिए यह सिर्फ संगठन में फेरबदल नहीं, बल्कि आने वाली राजनीतिक लड़ाई की तैयारी है।

अब सवाल है कि नई टीम में पुराने चेहरों को कितनी जगह मिलेगी? कितने नेताओं की छुट्टी होगी? और सबसे बड़ा सवाल...प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर कौन बैठेगा? क्योंकि RJD में अगला संगठनात्मक बदलाव सिर्फ पदों का फेरबदल नहीं होगा, बल्कि यह तय कर सकता है कि तेजस्वी यादव आने वाली राजनीतिक चुनौतियों के लिए अपनी पार्टी को किस चेहरे और किस रणनीति के साथ मैदान में उतारते हैं।





