एम्स पटना: हादसे या गंभीर बीमारियों के कारण अपने हाथ गंवा चुके मरीजों के लिए एम्स पटना से राहत भरी खबर सामने आई है। एम्स पटना में जल्द ही हैंड ट्रांसप्लांट यानी हाथ प्रत्यारोपण की सुविधा शुरू करने की तैयारी बड़े पैमाने पर की जा रही है। इस महत्वाकांक्षी योजना को धरातल पर उतारने के लिए अस्पताल प्रशासन ने स्टेट आर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट आर्गेनाइजेशन (SOTO) को औपचारिक आवेदन भेजा है। सोतो से आवश्यक मंजूरी मिलने के बाद संस्थान में दूसरे व्यक्ति का हाथ जरूरतमंद मरीजों में प्रत्यारोपित करने की ऐतिहासिक प्रक्रिया शुरू हो सकेगी। इस बीच एम्स प्रशासन ने ऐसे मरीजों को चिह्नित करने का काम भी शुरू कर दिया है, जिन्होंने किसी हादसे या अन्य कारणों से अपने दोनों हाथ गंवा दिए हैं।
युवा मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण
एम्स पटना की प्लास्टिक सर्जरी विभागाध्यक्ष डाॅ. वीणा सिंह के अनुसार, वर्तमान समय में उपलब्ध कृत्रिम हाथ (आर्टिफिशियल हैंड) हर मरीज को पर्याप्त कार्यात्मक सहायता प्रदान नहीं कर पाते हैं। कृत्रिम हाथों की अपनी सीमाएं होती हैं, जिससे मरीज दैनिक कामों को पूरी तरह सहजता से नहीं कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में हैंड ट्रांसप्लांट उन मरीजों के लिए एक बेहद कारगर और बेहतर विकल्प साबित हो सकता है, जिनके पास अपने हाथ नहीं हैं। यह सुविधा विशेष रूप से युवा मरीजों के लिए वरदान साबित होगी, क्योंकि इससे वे आत्मनिर्भर होकर अपनी दैनिक गतिविधियों को अधिक स्वतंत्रता और आसानी से अंजाम दे सकेंगे।
डाॅ. वीणा सिंह का कहना है कि हैंड ट्रांसप्लांट का मुख्य उद्देश्य केवल मरीज को शारीरिक रूप से हाथ की कार्यक्षमता वापस लौटाना ही नहीं है, बल्कि उसके खोए हुए आत्मविश्वास और जीवन की कुल गुणवत्ता में सकारात्मक सुधार लाना भी है।

कैसे होती है हैंड ट्रांसप्लांट की जटिल प्रक्रिया
हैंड ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया काफी जटिल और सूक्ष्म तकनीक पर आधारित होती है। इस प्रक्रिया में ब्रेन डेड घोषित किए गए किसी मरीज के अंगदान की निर्धारित और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है। दाता के शरीर से कोहनी के स्तर तक का हाथ लिया जाता है और उसे जरूरतमंद मरीज के शरीर में प्रत्यारोपित किया जाता है।
इस प्रत्यारोपण में वही माइक्रोसर्जिकल तकनीक अपनाई जाती है, जिसका उपयोग किसी गंभीर दुर्घटना में शरीर से अलग कटे हुए हाथ को दोबारा जोड़ने में किया जाता है। इसके तहत सूक्ष्मदर्शी की मदद से हड्डियों के साथ-साथ अत्यंत बारीक रक्त वाहिकाओं, नसों और टेंडन को आपस में जोड़ा जाता है। अंतर केवल इतना होता है कि इसमें कटे हुए हाथ की जगह किसी अन्य दाता का हाथ इस्तेमाल किया जाता है।
इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं और रिकवरी की प्रक्रिया
प्रत्यारोपण के बाद शरीर किसी बाहरी अंग या ऊतक को खारिज न कर दे, इसके लिए मरीज को विशेष प्रकार की इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं दी जाती हैं। डॉक्टरों और चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, प्रत्यारोपण के बाद नियमित थेरेपी और दवाओं के प्रभाव से कुछ ही महीनों के भीतर प्रत्यारोपित हाथ में धीरे-धीरे संवेदना और कार्यक्षमता लौटने लगती है। इससे मरीज अपने हाथ की उंगलियों और पंजे का इस्तेमाल करने में सक्षम होने लगता है।
गंभीर रूप से जले मरीजों के लिए स्थापित होगा स्किन बैंक
हैंड ट्रांसप्लांट की तैयारी के साथ-साथ एम्स पटना में गंभीर रूप से जले हुए मरीजों के इलाज के लिए स्किन बैंक स्थापित करने की दिशा में भी काम तेजी से चल रहा है। इस स्किन बैंक की स्थापना से उन मरीजों को बहुत बड़ी राहत मिलेगी, जो दुर्घटनाओं या आगजनी में 60 से 70 प्रतिशत तक जल जाते हैं। ऐसे गंभीर मामलों में मरीज की जान बचाने और उसके घावों को भरने के लिए दान में मिली त्वचा का उपयोग किया जाएगा।
स्किन बैंक में त्वचा प्राप्त करने के लिए भी ब्रेन डेड मरीजों की निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार, ब्रेन डेड घोषित होने के करीब 8 से 10 घंटे के भीतर ही दाता के शरीर से त्वचा निकालने की प्रक्रिया पूरी करनी होती है। इसके बाद प्राप्त त्वचा को विशेष वैज्ञानिक पद्धतियों और निर्धारित मानकों के तहत सुरक्षित रख लिया जाएगा, ताकि जरूरत पड़ने पर गंभीर रूप से जले मरीजों के इलाज में उसका समय पर उपयोग किया जा सके।
राज्य सरकार की मंजूरी और बजट का इंतजार
एम्स पटना में स्किन बैंक का संचालन शुरू करने के लिए राज्य सरकार के स्तर पर प्रक्रिया पूरी की जानी है। एम्स पटना प्रशासन ने स्किन बैंक की स्थापना और उसके सुचारू संचालन के लिए आवश्यक बजट तैयार करके राज्य सरकार को भेज दिया है। जैसे ही राज्य सरकार द्वारा राशि स्वीकृत कर दी जाएगी, वैसे ही स्किन बैंक को चालू करने की आगे की प्रशासनिक और तकनीकी कार्यवाही शुरू कर दी जाएगी।
एम्स पटना में हैंड ट्रांसप्लांट और स्किन बैंक जैसी आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के शुरू होने से बिहार के मरीजों को बहुत बड़ा लाभ होगा। इसके शुरू होने के बाद राज्य के मरीजों को उच्चस्तरीय और जटिल प्रत्यारोपण के लिए दूसरे राज्यों का रुख नहीं करना पड़ेगा और वे अपने ही राज्य में सस्ती व गुणवत्तापूर्ण इलाज की सुविधा प्राप्त कर सकेंगे।





