पटना: एम्स पटना के सर्जिकल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग ने पहली बार लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट करने में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। इस सफल प्रत्यारोपण के साथ ही संस्थान में लिवर ट्रांसप्लांट कार्यक्रम की एक मजबूत नींव रख दी गई है। यह ऐतिहासिक ऑपरेशन पटना के रहने वाले एक 54 वर्षीय पुरुष मरीज का किया गया है, जो ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस नाम की गंभीर बीमारी से पीड़ित थे। मरीज की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों के पास लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र जीवन रक्षक विकल्प बचा था। इस कठिन समय में मरीज की पत्नी ने आगे बढ़कर अपने लिवर का एक हिस्सा दान करने की इच्छा जताई। इसके बाद संस्थान की पूरी मेडिकल यूनिट ने 7 अगस्त को इस जटिल ट्रांसप्लांट प्रक्रिया को सफलता पूर्वक अंजाम दिया।
14 से 16 घंटे तक चली अत्यंत जटिल सर्जिकल प्रक्रिया
पटना एम्स के कार्यकारी निदेशक प्रोफेसर (ब्रिगेडियर) डॉ. राजू अग्रवाल ने बताया कि लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट एक अत्यंत जटिल और सूक्ष्म सर्जिकल प्रक्रिया होती है। इसमें एक ही समय पर दो बड़ी और गंभीर सर्जरी निष्पादित की जाती हैं। सबसे पहले एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर से लिवर का एक हिस्सा सुरक्षित तरीके से निकाला जाता है और फिर उसे बीमार मरीज के शरीर में प्रत्यारोपित किया जाता है। डॉक्टर अग्रवाल के अनुसार, इस प्रक्रिया के दौरान शरीर की प्रमुख रक्त वाहिकाओं और पित्त नलिकाओं का बेहद बारीक और सूक्ष्म तरीके से पुनर्निर्माण किया जाता है। इस पूरी जटिल सर्जरी को पूरा करने में लगभग 14 से 16 घंटे का समय लगा।
चिकित्सकों ने बताया कि मानव लिवर में प्राकृतिक रूप से पुनः विकसित होने की अद्भुत क्षमता होती है। ऑपरेशन के बाद समय बीतने के साथ डोनर और मरीज दोनों के शरीर में लिवर का हिस्सा अपने आप बढ़कर पर्याप्त और आवश्यक आकार प्राप्त कर लेता है। इस प्रत्यारोपण प्रक्रिया को शुरू करने से पहले डोनर यानी पत्नी और मरीज दोनों की विस्तृत एवं गहन चिकित्सकीय जांच की गई थी। जब सभी आवश्यक मानकों पर दोनों को पूरी तरह से सुरक्षित पाया गया, तभी इस ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।

विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम और मार्गदर्शन
यह सफल ट्रांसप्लांट गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर उत्पल आनंद के नेतृत्व में विकसित टीम द्वारा किया गया। इस कोर मेडिकल टीम में कई प्रमुख विशेषज्ञ शामिल रहे:
- सर्जिकल कोर टीम: डॉ. कर्णाल पराशर, डॉ. बसंत नारायण सिंह और डॉ. किसलय कांत।
- एनेस्थीसिया टीम: प्रो. उमेश कुमार भदानी, डॉ. कर्णाल सिंह और डॉ. रजनीश कुमार।
- इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी: प्रो. राजीव नयन प्रियदर्शी।
- गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग: प्रो. रमेश कुमार।
यह महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक प्रत्यारोपण सेंटर फॉर लिवर एंड बिलियरी साइंसेज (CLBS) की विशेषज्ञ टीम के प्रोफेसर सुभाष गुप्ता के नेतृत्व और समन्वय में सफलतापूर्वक पूरा किया गया।

इलाज का खर्च और आर्थिक सहायता की व्यवस्था
एम्स पटना के कार्यकारी निदेशक प्रो. डॉ. राजू अग्रवाल ने बताया कि इस जटिल और अत्याधुनिक लिवर ट्रांसप्लांट की कुल लागत लगभग 14 से 15 लाख रुपये आती है। आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों की मदद के उद्देश्य से गरीबी रेखा से नीचे (BPL) श्रेणी में आने वाले शुरुआती पांच मरीजों को एम्स रिलीफ फंड के माध्यम से आर्थिक सहायता प्रदान की गई है। इस आर्थिक मदद से गरीब परिवारों पर पड़ने वाले महंगे इलाज का बोझ काफी हद तक कम हो सकेगा।
संस्थान का मुख्य उद्देश्य बिहार और आसपास के पड़ोसी राज्यों के गंभीर मरीजों को उनके अपने ही क्षेत्र में उच्च गुणवत्ता वाली, अत्याधुनिक और किफायती लिवर ट्रांसप्लांट की सुविधा उपलब्ध कराना है। इसके अतिरिक्त, बिहार सरकार के मुख्यमंत्री राहत कोष से भी एम्स को आर्थिक सहयोग मिलने की उम्मीद व्यक्त की गई है। संस्थान की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि भारत सरकार के आयुष्मान कार्ड को फिलहाल इस विशेष लिवर ट्रांसप्लांट के इलाज से अलग रखा गया है।





