15 अगस्त 1947 को जब भारत का विभाजन हुआ और दुनिया के नक्शे पर पाकिस्तान नाम का एक नया देश अस्तित्व में आया, तब दोनों देशों के बीच जमीन, नदियों, सेना, पुलिस और यहां तक कि सरकारी सामानों का भी बंटवारा हुआ। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आजादी मिलने के बाद भी करीब 11 महीनों तक पाकिस्तान का अपना कोई केंद्रीय बैंक नहीं था? इस दौरान पाकिस्तान की वित्तीय व्यवस्था, सरकारी खजाना और उसकी पूरी अर्थव्यवस्था भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के भरोसे ही चल रही थी।
'पाकिस्तान ऑर्डर, 1947' और RBI की भूमिका
वर्ष 1935 में स्थापित हुआ भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अविभाजित ब्रिटिश भारत का केंद्रीय बैंक था। अगस्त 1947 में विभाजन के समय रातों-रात एक नया केंद्रीय बैंक खड़ा करना आसान नहीं था, क्योंकि इसके लिए केवल इमारतों की नहीं, बल्कि कड़े कानूनों, प्रशिक्षित अधिकारियों, नोट छापने की प्रेस और अंतरराष्ट्रीय बैंकों के नेटवर्क की आवश्यकता थी। पाकिस्तान के पास उस समय ऐसा कोई ढांचा मौजूद नहीं था।
इस वित्तीय संकट से निपटने के लिए दोनों देशों के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसे 'पाकिस्तान ऑर्डर, 1947' नाम दिया गया। इस समझौते के तहत यह तय किया गया कि जब तक पाकिस्तान अपना केंद्रीय बैंक स्थापित नहीं कर लेता, तब तक भारतीय रिजर्व बैंक ही पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के रूप में कार्य करेगा। दिलचस्प बात यह है कि उस समय RBI का राष्ट्रीयकरण नहीं हुआ था (यह 1949 में हुआ) और यह एक शेयरधारकों के स्वामित्व वाला संस्थान था।
भारतीय नोटों पर पाकिस्तान का ठप्पा
विभाजन के तुरंत बाद पाकिस्तान के पास नोट छापने की कोई तकनीक या व्यवस्था नहीं थी, जिसके कारण वहां भारतीय रुपये ही चलन में थे। अपनी संप्रभुता प्रदर्शित करने के लिए पाकिस्तान सरकार ने एक अनोखा तरीका अपनाया। भारत में छपने वाले 1, 2, 5, 10 और 100 रुपये के करेंसी नोटों के ऊपर अतिरिक्त छपाई की गई।
इन नोटों पर अंग्रेजी में 'Government of Pakistan' और वाटरमार्क के पास उर्दू में 'हुकूमत-ए-पाकिस्तान' छापा गया। नोटों का रंग, चित्र, डिजाइन और भारतीय गवर्नर के हस्ताक्षर वैसे ही रहे, बस उस पर पाकिस्तान का ठप्पा लगा दिया गया। यह व्यवस्था दर्शाती थी कि राजनीतिक रूप से अलग होने के बावजूद दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक ही तंत्र से जुड़ी हुई थीं।
स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान की स्थापना
पाकिस्तान ने जल्द ही अपने केंद्रीय बैंक के गठन की प्रक्रिया शुरू की। इसके लिए 12 मई 1948 को 'स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ऑर्डर' पास किया गया। इसके बाद, 30 जून 1948 को भारतीय रिजर्व बैंक ने पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के रूप में अपनी सेवाएं समाप्त कर दीं।
11 जुलाई 1948 को कराची में 'स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान' का आधिकारिक उद्घाटन हुआ। इसके पहले गवर्नर जाहिद हुसैन बने। इस ऐतिहासिक अवसर पर पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा था कि स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान की शुरुआत उनके राज्य की वित्तीय संप्रभुता का प्रतीक है।
चार चरणों में हुआ नोटों का बदलाव
पाकिस्तान में मुद्रा का विकास चार प्रमुख चरणों में हुआ:
- पहला चरण: शुरुआत में बिना किसी बदलाव के शुद्ध भारतीय नोटों का ही इस्तेमाल किया गया।
- दूसरा चरण: भारतीय नोटों पर 'Government of Pakistan' और 'हुकूमत-ए-पाकिस्तान' की मुहर लगाकर उन्हें चलाया गया।
- तीसरा चरण (अक्टूबर 1948): ब्रिटेन की प्रसिद्ध कंपनी 'थॉमस डी ला रू' से आपातकालीन नोट (5, 10 और 100 रुपये) छपवाकर मंगाए गए।
- चौथा चरण (मार्च 1949): स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ने अपने पहले आधिकारिक नोट जारी किए। इन शुरुआती 2 रुपये के नोटों पर अंग्रेजी और उर्दू के साथ बंगाली भाषा भी लिखी थी, क्योंकि उस समय पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) भी पाकिस्तान का हिस्सा था।
1949 में टूटा रुपये का रिश्ता
स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान की स्थापना के बाद भी कुछ समय तक भारतीय रुपये और पाकिस्तानी रुपये की कीमत बराबर (1:1) बनी रही। हालांकि, सितंबर 1949 में यह आर्थिक संबंध हमेशा के लिए समाप्त हो गया। जब ब्रिटिश पाउंड कमजोर हुआ, तो भारत ने अपने रुपये का अवमूल्यन करने का निर्णय लिया, लेकिन पाकिस्तान ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। इसके बाद दोनों देशों की मुद्राओं की कीमतें अलग हो गईं और उनके बीच के व्यापारिक संबंध जटिल हो गए।





